Thursday, 29 December 2016

सफ़र-कच्छ से घुमक्कड़ी दिल से..का महामिलन-ओरछा तक...

पिछले 5 वर्षो से दिसंबर-जनवरी के महीने मे कही न कही घुमने जाता ही हु.. तो ऐसे ही जनवरी 2015 मे कच्छ मोटरसाइकिल यात्रा पर था. कच्छ यात्रा के दौरान काळाडूंगर मे नीरज जाट भाई से अनायास मुलाकात हो गई,परिचय हुवा,2 दिन साथ घुमे,इंदौर आकर सोशल मिडिया पर पता चला,यह मनमौजी(नीरज) तो घुमक्कड़ी की दूनिया का ध्रुवतारा है...।
इसके बाद इस मनमौजी घुमक्कड़ से प्रगाढ़ मित्रता हुई,साथ साथ घुमना भी चलता रहा.. जनवरी 2016 मे हम दोनों किन्नौर-स्पीति की यात्रा पर थे... तब ये महाशय एक  व्हाट्सएप्प ग्रुप-घुमक्कड़ी दिल से..पर लगे रहते थे..तब ही मन बन गया था,घुमक्कड़ी दिल से...से जुड़ने का.. यात्रा से वापस आते ही,इस ग्रुप के फेसबुक पेज से जुड़ा,और फिर व्हाट्सएप्प ग्रुप से जुड़ने के लिए इच्छा जाहिर कर दी,मेरी पुकार प्रकाश यादव जी ने सुन ली और जुड़वा दिया व्हाट्सएप्प ग्रुप से भी।
ग्रुप मे आते ही देखा यहाँ हर उम्र वर्ग के कई ब्लॉगर,फोटोग्राफर, घुमक्कड़ शामिल है.. सभी से अनोपचारिक परिचय हुवा... सभी का एक शौक था...घुमना.. तो बस यहाँ मन लग गया.. यहाँ घुमने की बातों के साथ एक दुजे की टांग खिंचाई चलती रहती है...
मस्ती मस्ती मे ही नवम्बर 2016 मे,ग्रुप के सदस्य विनोद गुप्ता भाई और योगेश सारस्वत जी ने मिलकर प्रस्ताव रख दिया की हो जाय.. एक महामिलन औरछा (झाँसी) मे... महामिलन की तारीख़ एकमत से 24-25 दिसंबर 2016 पक्की हो गई।
आमतौर पर विनोद भाई अपनी मायानगरी से बहार नहीं निकल पाते है, इसलिये महामिलन मे उनके शामिल होने पर यकीन करना किसी के लिए भी आसान नहीं था,इसी कारण से नीरज भाई ने विनोद भाई को उकसाया की आप नहीं आ पावगे.. तो अन्य सदस्य भी कहने लगे, विनोद भाई करवा लो रेलवे आरक्षण,तो विनोद भाई ने अगले दौ तीन दिन बाद ही ओरछा आने के लिए रेलवे टिकीट का आरक्षण करवा लिया...
बस फिर क्या था,बाक़ी सभी सदस्यों भी लग गये ओरछा आने की तैयारी मे,और घुम्मकड़ी दिल से..मे अब बस केवल ओरछा महामिलन के सपने संजोये जाने लगे।
वही मुझे 14 दिसंबर से नीरज भाई के साथ राजस्थान-थार मोटरसाइकिल यात्रा पर जाना था,वापसी का कुछ निश्चित नहीं था कब होगी,तो ओरछा महामिलन के लिए सोच लिया था,जब जाना होगा, चले जायँगे,इंदौर से ओरछा 550 किलोमीटर के आसपास ही है, भोपाल से झाँसीे की खुब रेलगाड़ी मिल जाती है,आरक्षण की भी कोई जरूरत नहीं है,जाना हुवा तो चल पड़ेंगे,रेलवे के जनरल डिब्बों के भी मज़े ले लेंगे।
ऐसा सोचकर चला गया थार-राजस्थान... थार यात्रा 14 दिसंबर को शुरू हो गई,घूमते घामते 20 दिसंबर की रात नीरज एंड फैमली के साथ रामदेवरा रुके,आगे का प्रोग्राम यह था कि,21 दिसंबर को बीकानेर रूककर,22 को मे इंदौर और नीरज भाई दिल्ली की और चले जायँगे..
21 की दोपहर बीकानेर पहुँचे,अब यहाँ से देशनोक-करणी माता के लिए रवाना हुवे ही थे कि, अचानक एक चौराहे पर मोटरसाइकिल रोककर नीरज भाई कहने लगे,भाई अब में दिल्ली जा रहा हु,में 22 को दिल्ली पहुँच कर एक एक्स्ट्रा ड्यूटी करना चाहता हु,जिससे 24-25 को ओरछा महामिलन मे शामिल हो पाउ..मेरी भी महामिलन मे शामिल होने की प्रबल इच्छा है...अब ओरछा मे मिलेंगे,दोनों के फ़ोटो वीडियो भी एक दुजे के पास है, उसका आदान-प्रदान भी वही करेंगे। और हो गई टाटा टाटा,बाय बाय...
में 21 दिसंबर की रात पुष्कर रुकते हुवे,22 दिसंबर की रात इंदौर आ गया... इंदौर पहुँचने पर मेरी स्थित यह थी कि  क्लीनिक 10 दिनों से बंद है, मरीज़ परेशान हो रहे थे.. ओरछा जाने का बिल्कुल मन नहीं था,क्योकि जाता हु तो क्लीनिक अब 26 दिसंबर को खुल पायेगा,बाकि महामिलन मे आने वाले जितने अनजाने दोस्त है, सब अपने बन जायँगे... (मुझे अनजाने दोस्त बहुत पसन्द है।) लेकिन एक लालच था कि नीरज से फ़ोटो और विडीयो का बेशकीमती डाटा भी लेना है...
तो सभी नुकसान की परवाह किये बगैर 23 दिसंबर की रात चल पड़ा भोपाल के रास्ते ओरछा (झाँसी) के लिए... 24 को ओरछा पहुँचने पर नीरज का मेसेज आ गया,ऑफिस मे सभी पहले से छुट्टी पर चले गए, उनकी शिफ्ट भी मुझे करना है,छुट्टी नहीं मिल पा रही है, नहीं आ पाउँगा.. यह सुनकर बहुत निराश था,निराशा की वजह यह नहीं थी कि थार के फ़ोटो नहीं मिल पायँगे... बल्कि यह थी कि घुमक्कड़ी के ध्रुव तारे,मनमौजी दोस्त के साथ एक दिन और बिताने का मौका गया.. मुझे यह भी देखना था कि इस मनमौजी इंसान का,अपने चाहने वाले और मौजमस्ती मे टांग खिंचाई करने वालो से कैसा मेलजोल होता है... लेकिन अब यह सब नहीं होना था...
इन सब बातों को भूलकर में दबे मन से महामिलन की हाहाहा,हीहीही मे कही खो गया... मुकेश पाण्डेय जी ओरछा महामिलन के व्यस्थापक थे,उनकी हर व्यवस्था मानो यह कह रही थी कि ऐसे ही किसी को भी व्यवस्थापक नहीं बना देते है... खाने की विवधता से लेकर ठहरने की व्यवस्था सब कुछ चाकचौबंद था... कुल मिलाकर ओरछा मिलन यादगार रहा। यहाँ सुशांत सिंघल जी,नटवर भाई,पंकज भाई जैसे वरिष्ठ फोटोग्राफर थे। तो बिनु भाई जैसे ट्रैकर,अपने ज़माने के जानेमाने ब्लॉगर भालसे जी,तो जगत बुवा दर्शन जी भी थी। वही इन सब के बीच कौशिक जी बता रहे थे कि यूँही किसी को एडमिन नहीं बना देते है। आई.टी एक्सपर्ट प्रकाश यादव जी भी थे,तो नए ज़माने के ब्लॉगर आर.डी भाई और सचिन त्यागी जी और कमल भाई भी थे।
इन सभी के साथ सचिन जांगड़ा की गाड़ी न्यू ही चाल रही थी..और विनोद को हर कोई पीटने मे लगा था। सूरज मिश्रा,डॉ.प्रदीप त्यागी,चाहर साहब,प्रतिक भाई,मनोज भाई भी सभी से हँसते हँसते मिल जुल रहे थे... बस संदीप मन्ना, रजत शर्मा,संजय सिंह जी,हेरी भाई,अलोक जी,सहगल जी और में ही थोड़े से  खामोश थे... रूपेश भाई कमरों का आवंटन करने मे लगे रहे।
वैसे तो में महिलाओं के बीच गया नहीं,फिर भी मैने श्रीमती हेमा,श्रीमती कविता भालसे,श्रीमती आभा त्यागी,श्रीमती नीलम कौशिक,श्रीमती नयना यादव,श्रीमती रश्मि गुप्ता जी को मैने यह तक कहते सुना की रोमेश जी उर्फ़ तात श्री,सुशांत सिंघल जी उर्फ़ ताऊ,और दर्शन जी उर्फ़ बुआ,अपने आप को 21 की उम्र का साबित करने मे लगे है...😁😁
बच्चा पार्टी को भी देख कर लग रहा था इनमे से भविष्य मे कई भावी घुमक्कड़,फोटोग्राफर,और कुछ इसी ग्रुप के एडमिन बनेंगे, इनमे शामिल थे..
देवांग त्यागी,युवराज कौशिक,अंशुल कौशिक,अक्षत गुप्ता,अंशिता गुप्ता,इशिका यादव,अंशिका यादव,कुणाल सिंह,साक्षी सिंह ने भी बहुत धमाल मचाया... हेमा जी की नन्ही सी साक्षी ने तो सभी को मोहित कर रखा था।
बाहेती जी भी आँधी की तरह आये और तूफ़ान की तरह चले गए। फिर तो सभी मे वापस जाने की होड़ सी मच गई,फिर हम भी चल पड़े...और कह दिया अलविदा ओरछा...😢😢
महामिलन मे मिलन अनजान से अपने बनने वाले मित्र है..
1.सचिन कुमार जांगड़ा
2.हरेंद्र भाई
3.सूरज मिश्रा
4.मुकेश पाण्डेय जी और अनिमेष बाबू
5.रूपेश शर्मा जी
6.रितेश गुप्ता जी सपरिवार
7.संजय कौशिक जी सपरिवार
8.सुशांत सिंघल जी
9.रोमेश शर्मा जी
10.बिनु भाई
11.नरेश सहगल जी
12.कमल सिंह भाई
13.डॉ प्रदीप त्यागी जी
14.नटवर भाई
15.संजय सिंह जी
16.हेमा जी
17.मुकेश भालसे जी सपरिवार
18.विनोद भाई
19.प्रतिक भाई
20.बुआ जी
21.मनोज़ भाई
22.आलोक जी
23.सचिन त्यागी जी सपरिवार
24.सत्यपाल चाहर सहाब
25.नरेश चौधरी जी
26.संदीप मन्ना भाई
27.किशन बाहेती जी
28.रजत शर्मा
29.आर.डी भाई
30.प्रकाश यादव जी सपरिवार
देवेन्द्र कोठारी जी, महेश सेमवाल जी, योगी जी, प्रतिमा जी, हर्षिता जी, कपिल जी,प्रदीप जी,सुशिल जी,राजेश जी,संतोष तिड़के जी,अमित गोडा जी,अनिल भाई,चंद्रेश जी समेत अन्य कई सदस्य भी महामिलन मे शामिल नहीं हो पाये... सभी की कमी खली...

यहाँ पर क्लिक करवाना कैसे कोई छोड़ सकता था।

औरछा का सिग्नेचर क्लिक...बेतवा नदी और क्षत्रियो का दृश्य


एडमीन जी कहते हुवे...रे भाई यु ही किसी को एडमिन नहीं बना देते है...😊



घुमक्कड़ी दिल से ... मिलेंगे फ़िर से



नीरज और सुमित स्पीति में...

घुमक्कड़ी दिल से ... सावन भादो के साये में

सेल्फी एक्सपर्ट पंकज शर्मा के साथ सभी घुमक्कड़

सबसे आखिरी में आये किशन बाहेती जी के साथ ग्रुप फोटो

यहीं था 24 और 25 को सभी का ठिकाना

हाल ही की थार यात्रा के दौरान परम मित्र नीरज के साथ

24 की रात की थाली

हमारे तातश्री सुबह-सवेरे अपनी ही दुनिया में

25 दिसंबर का खास भोजन


इंदौरी पोहा, ओरछा की गुझिया और आगरा का पेठा - अदभुत संगम


कान्फ्रेंस हाल में - घुमक्कड़ी दिल से

पांडेय जी और कौशिक जी अपने ही मूड़ में


नरेश सहगल जी बी.एस.एन.एल.सिग्नल की खोज में




छोटे कौशिक जी युवराज

ब्लॉगर श्रीमति कविता भालसे जी

सचिन त्यागी जी के सुपुत्र देवांग त्यागी

मुंबई के नकली डॉन विनोद गुप्ता जी
सभी फ़ोटो साभार घुमक्कड़ी दिल से प्राप्त किये ।

Sunday, 25 January 2015

इंदौर से अहमदाबाद INDORE TO AHMEDABAD.


सबसे पहले आप सभी को सप्रेम नमस्कार...

में डॉ.सुमित शर्मा इंदौर,मध्य प्रदेश से हु।

यह मेरा पहला ब्लॉग हे,में अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ लिखनें की कोशिश करूँगा,फिर भीअगर नाकाफी लगे तो अभी से माफ़ी चाहूँगा।

तो अब सीधे यात्रा वृतांत की शुरूवात करते है,
15 जनवरी से 19 जनवरी तक का समय था मेरे पास और योजना थी लंबी बाइक ट्रीप की,योजना में कई जगहें थी,जैसे कि माउंट आबु पर्वत राजस्थान, चिखलधारा महाराष्ट्र,इस सूची मे हिमालय-लेह लद्दाख भी शामिल हो सकता था,जहाँ जाना मेरा सपना है,लेकिन इसके लिए समय और मौसम नाकाफी थे।

इसीलिए अंतिम निर्णय कच्छ का ही हुआ।
कच्छ भारत के पश्चिम में सबसे अंतिम छोर पर है,यहाँ उत्तर की और हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान है,पश्चिम में कच्छ की खाड़ी और अरब सागर स्थित है,दक्षिण में भुज और पूर्व में भचाऊ व अन्य शहर है।
यहाँ कच्छ का सफ़ेद रण प्रमुख पर्यटक केंद्र है,जहाँ सालो पहले समुद्र था,पर अब वह सुख चूका है,फिर भी बारिश के मौसम में यहाँ पानी जमा हो जाता है,और फिर बारिश के मौसम के ख़त्म होते ही सुखना शुरू हो जाता है,और दिसम्बर-जनवरी तक पुरी तरह सुख कर सफ़ेद रेगिस्तान या नमक का रेगिस्तान बन जाता है,लोग कहते है यह रेगिस्तान बहुत खुबसूरत दिखता है,कितना खुबसूरत है सफ़ेद रण, यह तो पहुँचकर ही पता लगेगा।
सफ़ेद रण के अलावा भी वहाँ कई सारी जगह है,आखिर कच्छ भारत का सबसे बड़ा जिला है।

कुछ वर्ष पहले तक यहाँ पर्यटकों का इतना आना जाना नहीं था,लेकिन जबसे कच्छ की ब्रांडिंग जो की पहले गुजरात के पुर्व मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और अब अमिताभ बच्चन जी के द्वारा गई,कुछ उसका असर है और कुछ इस जगह का जादु,की आज यह रेगिस्तान भारत के टॉप 10 पर्यटक केन्द्रो में काफी उचे पायदान पर शामिल है ।

ट्रीप में मेरे साथी थे मेरी हमराही मतलब मेरी बुलेट और मेरा परम मित्र डॉ.गिरधर,बस हम 3 ही थे और कोइ नहीं,क्योकि ट्रीप में मुझे ज्यादा भीड़ पसंद नहीं है,भीड़ होने पर हम अपने मन की नहीं कर पाते,और मुझे अपनी योजना पर यात्रा करना पसंद है।

यह यात्रा 5 दिनों की थी।
पहला दिन-
हमारी मंजिल कच्छ का सफ़ेद रण था,इंदौर से करीब 850 कि.मी दुर,पहले दिन के लिये तय किया था कि 600कि.मी के करीब दुरी तय करेंगे,बाकि बची दुरी अगले दिन तय करेंगे।
सारी तैयारी मसलन बाइक सर्विस, पैकिंग सभी 14 जनवरी की रात में ही कर लिया था,योजना अनुसार हमे 15 जनवरी की सुबह 5 बजे इंदौर से रवानगी लेंनी थी,तो मैँ 14 जनवरी की रात क्लिनिक का काम खत्म करने के बाद घर से मम्मी व पापा जी से अलविदा कहते हुवे गिरधर के घर पहुँच गया।

रात में ही बची कुची पेकिंग कर के जल्दी ही सोने की तैयारी कर ली थी,फिर भी रात के 11 तो बज ही गये थे,सोये तो सही पर नींद किसे आना थी,जैसे तैसे रात ख़त्म हुई,मेने सुबह 4 बजे तैयारी शुरू कर दी थी,गिरधर भी जाग के तैयारी मे लग गया था।

फिर भी सुबह 5.20 पर हम घर से निकल पाये,रास्ते के मंदिर में देव दर्शन कर और श्रीमती जी के कहे अनुसार ॐ विष्णवे नमः का मनन करते हुवे यात्रा शुरू की ।
शहर में तो ज्यादा ठंड नहीं थी,लेकिन शहर के बाहर अच्छी खासी ठंड थी।

हमारा पहला लक्ष्य अहमदाबाद पहुँचना था,मार्गो की अगर बात करे तो इंदौर से अहमदाबाद पहुचने के लिए तीन मुख्य मार्ग है..
1.NH-59 इंदौर से धार व झाबुआ होते हुवे दाहोद के रास्ते अहमदाबाद।
इस मार्ग से इंदौर से अहमदाबाद की दुरी सबसे कम 398 कि.मी. है।
इस मार्ग पर अभी निर्माण कार्य हो रहा है और धार से झाबुआ के बीच आदिवासियों के द्वारा लूट आम बात है,ऐसा कई लोग कहते है,अब में तो कभी गया नहीं उस रास्ते,फिर भी हमने इस रास्ते जाना उचित नहीं समझा।
2.NH-3 से मनावर कुक्षी व छोटा उदयपुर के रास्ते बड़ौदा होते हुवे अहमदाबाद
इस मार्ग की स्थिति तो ठीक थी,पर यह हमारा जाना पहचाना नहीं था।
इस मार्ग से इंदौर से अहमदाबाद की दुरी 481 कि.मी.है।
3.इंदौर से बदनावर होते हुए थांदला के रास्ते लिमखेड़ा होते हुए अहमदाबाद ।
इस मार्ग से इंदौर से अहमदाबाद तक की दुरी 451 कि.मी.है।
इस मार्ग की स्थिती सबसे अच्छी व सबसे सुरक्षित है।
इसकी पुष्टि मेने इंदौर बस स्टेशन से गुजरात परिवहन निगम की इंदौर-अहमदाबाद बस के ड्राइवर व कंडक्टर से कर ली थी।

तो सुबह के 5.40बजे,हम अहमदाबाद पहुँचने के लिए नीमच हाईवे पर आ गये।
इस समय हाईवे पर,सुबह सुबह के सुनसान माहौल में बुलेट की डुग डुग बड़ी सुखद सुनाई दे रही थी।
मौसम की अगर बात करे तो इंदौर के बाद बेटमा से मौसम काफी ठंडा और साथ ही साथ कोहरा भी था, शुरुवात में स्पीड 60 की रही होगी,लेकिन सुर्य देव के निकलने के साथ साथ हम 70 की स्पीड से आगे बढ़ते रहे।
तो इस तरह हम सुबह 7.15 बजे बदनावर पहुँचे,अब तक हम 100 कि.मी.की दुरी तय कर चुके थे,यहाँ पर हमने 10 मिनीट का आराम किया,गिरधर भाई ने अब तक बेग को कंधे पर टाँग रखा था,पर अब उसे साइड में साडीगार्ड के पास रस्सी से बांध दिया,अब वह भी आराम से बैठ सकता था,यहाँ गिरधर द्वारा ली गई रस्सी बड़ी काम आई।
यहाँ से निकलते समय 1-1टुकड़ा गुड़तिल की चिक्की खा ली, इससे थोड़ी गर्मी और ऊर्जा दोनों मिली,महेश भैया शुक्रिया,आप के द्वारा लाई गई चिक्की ने अगले 2 दिन साथ दिया।

बदनावर से हमे दाहिनी और मुड़ना था,पेटलावद की ओर,बदनावर से पेटलावद की दुरी करीब 55कि.मी. थी,पेटलावद से ही आदिवासियो का क्षेत्र शुरू हो जाता है,पेटलावद के बाद हम थांदला पहुचे।
थांदला से गुजरात में 2 मार्गो से प्रवेश कर सकते है,
1.थांदला से मेघनगर होते हुवे दाहोद,इस मार्ग की मध्य प्रदेश सीमा पर अच्छी स्थिती नही है।
2.थांदला से लिम्बडी होते हुवे लिमखेड़ा,इस मार्ग से दाहोद बाईपास हो जाता है,इस मार्ग पर कही कोई खराबी नहीं थी तो हमने इसे ही चुना था
दोनों मार्गो में दुरी का भी कोई खास फर्क नही है।
तो हम थांदला से लिम्बडी पहुच चुके थे,लिम्बडी के कुछ पहले से ही गुजरात की सीमा शुरू हुई,लेकिन यहाँ कोई खास बड़ा बोर्ड नहीं था,फिर भी रूककर कुछ फोटो लिये और आगे बढ़ गये।
इस तरह हम सुबह के 9.30बजे के करीब गुजरात राज्य मे पहुच चुके थे
यही से गाडी को गिरधर के हवाले कर में पिछली सीट पर बैठ गया।

कुछ ही देर मे हम लिमखेड़ा पहुच गये,लिमखेड़ा से दाहोद -अहमदाबाद मार्ग पर पहुचना होता है,यह NH59 ही था जिसकी हालत म.प्र में जितनी खस्ता है,गुजरात मे उतनी ही शानदार थी।
यहाँ से अहमदाबाद की दुरी170 कि.मी.थी,यही पर 5 मिनीट का आराम व थोड़ी चहल कदमी कर,एक एक चिक्की खाकर सफ़र फिर शुरू कर दिया।
बदनावर से लिमखेड़ा तक 2 लेन रोड था,लिमखेड़ा से अहमदाबाद तक शानदार 4 लेन शरू हो गया था,तो गाडी की स्पीड भी 80 के आसपास कर हम आगे बढ़ते रहे।
लिमखेड़ा से पिपलोद,गोधरा होते हुऐ हम कठलाल पहुचे।
फिर से 5 मिनीट का आराम और 1-1 चिक्की स्वाद ले कर अब फिर से मेंने गाडी को चलाना शुरू किया और गिरधर पिछली सीट पर से नज़ारे देखने लगा।

अब हम अहमदाबाद के करीब थे,देखते ही देखते कई सारे दौ पहिया वाहनों,के अगले सीरो पर मुड़े हुए तार लगे हुए दिखाई देने लगे,इसकी तस्वीर भी शामिल की है,
हम दोनों की समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या बला है,तो गिरधर के कहने पर मेने गाड़ी साइड में रोक कर एक एक्टिवा वाले अंकल से पूछ ही लिया,उन्होंने बताया की इसे पतंग की डोर से बचाव के लिए लगाया जाता है,यहाँ पर पतंगबाज़ी का इतना माहौल रहता है कि अगर इसे ना लगाया जाय तो पतंग की डोर में उलझ कर जान भी जा सकती है,ऐसी दुर्घटना पहले हो चूँकि है,तभी इसे डोर से बचाव के लिए लगाया जाता है,अब जाकर हम दोनों का दिमागी कीडा शांत हुआ।

यहाँ से जैसे जैसे हम अहमदाबाद की और जा रहे थे,आसमान में रंगबिरंगी पतंगों की तादात बढ़ती जा रही थी,बढ़ती भी क्यों न आज मकर संक्रांति जो थी,गुजरात में मकर संक्रांति त्यौहार का बहुत माहौल रहता है,और इस दिन पर पतंगबाजी वह भी अहमदाबाद की,जोकि विश्वविख्यात है।
खुले आसमान में रंगबिरंगी पतंगों का झुरमट देख बहुत अच्छा लग रहा था,ऐसे में पता ही नहीं चला कब अहमदाबाद शहर में आ गये।
हम करीब दोपहर 2.00 बजे अहमदाबाद शहर में पहुच गए थे,अहमदाबाद शहर काफी फेला हुआ है,इसे पार करने में ही हमे 1 घंटे का समय लग गया जबकि मकर संक्रांति की छुट्टी के कारण रोड पर बहुत ज्यादा ट्रैफिक नहीं था।
अहमदाबाद में रुकने या तफ़रीह की हमारी कोई योजना नहीं थी इसीलिए आगे बढ़ते हुए हम सरखेज होते हुए साणंद के लिए रवाना हो गये।
इस तरह हम अब इंदौर से चल कर अहमदाबाद के पार पहुच गये।

यहाँ पहुँचने पर समय दोपहर के 3.30 हो रहा होगा, इस तरह सुबह 5.30 से अब तक 460 कि.मी की दुरी तय कर चुके थे,मतलब पहला लक्ष्य जो कि अहमदाबाद पहुँचना था,उसे पुरा कर चुके थे,फिर भी हमारी दिल्ली यानि कि कच्छ का रण अभी भी करीब 400 कि.मी दुर था।

हमारी अब तक की यात्रा बहुत अच्छी रही,रोड भी सभी जगह अच्छी थी,और गाड़ी की तरफ से भी कही कोई रूकावट नहीं आई,नाहि हमे कोई थकान,तो बस अभी और आगे जाना था...
पर अगर खाने की बात करे तो सुबह से अब तक इंदौर की चिक्की के अलावा हम ने अब तक कुछ और नहीं खाया था,वैसे मुझे सफ़र के दौरान खाने में हल्का खाना ही पसंद है,पर गिरधर भाई को ठीक से खाना ही पसंद है,तो अब हम अहमदाबाद के पास साणंद पहुँचकर कुछ खाने की तलाश करने लगे...
....
अब यहाँ से आगे की यात्रा का वर्णन अगले पोस्ट में जल्द ही करूँगा।
तब तक के लिये अलविदा.....





सुबह-सुबह का मौसम,शानदार रोड...और बुलेट की डुग डुग


सफ़र की साथी

गुड़ तिल चिक्की

मध्यप्रदेश-गुजरात सीमा पर...



डॉ.गिरधर और उसके पिछे शानदार दहोद-अहमदाबाद हाईवे.

गुजरती अंकल और उनकी गाड़ी पर लगी तार की फ्रेम,पतंग की डोर से बचाव के लिए.
अहमदाबाद शहर
सबसे जरुरी आवेदन