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Sunday, 12 August 2018

जोगी भड़क - इंदौर के पास सर्वश्रेष्ठ झरना

जोगी भड़क झरना / Jogi Bhadak Waterfall Of Indore

यात्रा दिनांक - 29 जुलाई 2018


अगर आप मानसून सीजन में इंदौर के आसपास पिकनिक स्पॉट की किसी से भी जानकारी लेंगे तो आप को पातालपानी जाने सलाह ज़रूर मिल सकती है। और जब सलाह मिलनी शुरू होती है तो, इंदौर के आसपास के पिकनिक स्पॉट की एक बड़ी पंक्ति तैयार हो जाती है। यह पंक्ति पातालपानी से शुरू होकर, तिन्छा फॉल, शीतलामाता फॉल, महेंदी कुंड, बामनिया कुंड, गिद्ध खोह तक चली जाती है। निःसंदेह यह सारी जगहें मानसून के दौरान और बाद में अतिदर्शनीय होती है। लेक़िन मानसून के सीजन में यहाँ भीड़ भी ठीक ठाक ही होती है। सप्ताहांत को पातालपानी पहुँच कर तो लगता है, सारा इंदौर यहीं आ गया। नतीज़न अगर आप एकांत और विशुद्ध प्राकृतिक दृश्यों की तलाश में वहाँ जाते है तो उससे से वंछित रह सकते है।

आज हम एक ऐसी जगह के बारे में बातें करेंगे जो इंदौर के बहुत पास है। और विशुद्ध प्राकृतिक रूप में है। और निश्चित ही एकांत में है। वो जगह है जोगी भड़क झरना।

वैसे महू-मानपुर के आसपास के लगभग सभी झरनों का स्त्रोत जानापाव पहाड़ी (श्री परशुराम जी की जन्मस्थली) से उद्गमित होने वाली नदियों से ही जुड़ा है। जानापाव पहाड़ी से चोरल नदी, चम्बल नदी,गम्भीर नदी और इनकी सहायक नदियों  - अजनार, कारम, अंगरेर, धमनी, नखेरी का उद्गम होता है।

जानापाव की पहाड़ी विंध्य रेंज का हिस्सा ही है। चम्बल नदी जानापाव पहाड़ी से उद्गमित होकर अपनी सहायक नदियों के साथ जब ढाल तक पहुँचती है तो जोगी भड़क झरने से एक घाटी में गिरती है। यह घाटी सर्पिलाकार लिए बहुत दूर तक फैली है। यहीं घाटी और झरना जोगी भड़क को एक खूबसूरत जगह बनाते है। यह जगह अब तक मध्यप्रदेश टूरिज्म के मानचित्र पर नहीं होने का कारण अपनी प्राकृतिक अवस्था मे ही है। आसपास रैलिंग या दीवार नही होने के कारण दूर से ही झरने के बढ़िया दीदार होते है। लेक़िन सुरक्षा का भी ध्यान हमें ही रखना होता है। 
अब अगर चम्बल नदी की यहाँ से आगें के सफ़र की बात करें तो, चम्बल नदी यहाँ से धार, रतलाम, मंदसौर, चित्तौड़, भिंड, मुरैना, होते हुवे धौलपुर में प्रवेश करती है और मुरैना और धौलपुर के बीच  मध्यप्रदेश व राजस्थान की सीमा रेखा बनाती है। चम्बल नदी ही राजस्थान की एक मात्र नदी है जो अन्तर्राज्यीय सीमा बनाती है। साथ ही राजस्थान के बढ़े हिस्से को संचित भी करती है। चम्बल, यमुना नदी की सहायक नदी है। अपने राजस्थान तक के सफ़र के बाद वो उत्तरप्रदेश के इटावा जिले के मुरादगंज में यमुना नदी के साथ सम्मिलित जाती है।
तो यह थी जोगी भड़क झरने की प्रमुख जानकारी। आप भी यहाँ जरूर जाइये, लेक़िन एक वादा अपने आप से करियेगा की आप वहाँ कोई गंदगी नहीं करेंगे। पन्नी,पानी की बोतल जैसा अपना कचरा अपने साथ वापस लेकर आएंगे। 

चलिये अब आपके संभावित प्रश्नों के जवाब देने की कोशिश करता हु।
1. जोगी भड़क कहाँ है, यहाँ कैसे पहुँचे ?

जोगी भड़क इंदौर से क़रीब 60 किलोमीटर की दूरी पर है और मानपुर के पास ढाल गाँव में स्थित है।
यहाँ पहुँचने के लिए इंदौर से ए.बी रोड़ पर  मुम्बई की ओर मानपुर से थोड़ा आगें जाना होता है। मानपुर घाट के समाप्त होते ही, दायीं ओर (सीधे हाथ की दिशा में) एक पक्की सड़क हिरापुर की ओर जाती है, ए.बी रोड़ से इधर ही मुड़ना होता है। इस छोटी सड़क के पहले बाएं मोड़ से (स्कूल के पास से) एक कच्ची सड़क ढाल गाँव की ओर जाती है। क़रीब एक किलोमीटर बाद तालाब के आगे सड़क समाप्त हो जाती है। यहीं गाड़ी की पार्किंग कर, कुछ पैदल चलना होता है। बस फिर आप जोगी भड़क पहुँच जाते है।
अगर झरने को और अच्छा दृश्य देखना चाहते है तो झरने के पीछे बने पुल को पार कर के सामने वाले पाट पर भी जा सकते है। वहाँ से झरने और सर्पिलाकार घाटी का दृश्य बहुत सुंदर दिखाई देता है।

2. जोगी भड़क झरना देखने का सबसे अच्छा मौसम ?
गर्मी के मौसम को छोड़कर कभी भी जा सकते है। मानसून शुरू होते ही यहाँ की रंगत बिल्कुल हरी हो जाती है, और यही बेस्ट टाइम है इस जगह जाने का, लेक़िन अधिक बारिश के समय आखरी 1 किलोमीटर के कच्चे मार्ग पर कीचड़ फ़िसलन हो सकती है। इससे बचने के लिए मानसून के बाद का समय भी ठीक रहता है।

3. खाने की व्यवस्था ?
 जोगी भड़क के आसपास छोटे गाँव ही है, आसपास किसी प्रकार की व्यावसायिकता नहीं है। आपकों खाना-पानी घर से ही ले जाना चाहिए। घर से नही ले जा रहे है तो जाते समय मानपुर से भी ले सकते है।

4. पहुँचने के साधन ?
 केवल निजी वाहन से ही जा सकते है। चार पहिया वाहन भी ले जा सकते है। किसी भी वाहन से जाइये आखरी के 1-2 किलोमीटर पैदल जाना होता है। वैसे सड़क निर्माण कार्य प्रगति पर है..निर्माण पूर्ण होने के बाद कोई दिक्कत नही आएगी।
अब कुछ फ़ोटोग्राफ़ देखिए।
मानपुर-घाट-थोड़ा आगे से दाएं मोड़ पर ढाल गाँव के लिए मुड़ना होता है।


खूबसूरत मंज़िलो की राहें भी कम खूबसूरत नही होती है।

जोगी भड़क के आसपास के गाँव भी खूबसूरत है..ऐसे ही एक गाँव,हिरापुर के पास का दृश्य..

साथ में नन्हें घुमक्कड़ कियान और उनकी दादी भी थे..

कियान की मम्मी- दीप्ति भी साथ थी..


महू-मानपुर क्षेत्र में सागवान के पेड़ भी बहुत है..

 हैल्लो और कितना बाक़ी है..?

 ये लो जी आ गया..

झरने के आगे की घाटी भी बहुत खूबसूरत है..आगें जाकर सर्पिलाकार हो जाती है। इस बार तो उधर नही गया। फिर कभी जाऊँगा।






गूगल मैप ने हमें हिरापुर वाले रास्ते से जोगी भड़क पहुँचाया था। यह रास्ता थोड़ा घूमते हुवे जोगी भड़क के पास पहुँचता है। जबकि ढाल होते हुवे जाने पर दुरी 8 किलोमीटर कम रहती है। हिरापुर में इन बच्चों से जोगी भड़क झरने की राह पूछी तो ये हमें खुद ही झरने तक ले गए। चारों के नाम है- देवकन्या, शिवकन्या, ऋतुकन्या, विमला।

बेशक वे हमारे साथ कुछ खाने और पैसों के लालच में आये होंगे। हमने भी उन्हें निराश नही किया। आखिर वे हमारी गाइड बनी थी।
एक फोटू हमारा भी..

एक वीडियो भी है..



Friday, 10 August 2018

उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग - 10 धराली से विकासनगर, दिल्ली व इंदौर वापसी



3 जून - 15 जून 2018
भाग 10 - धराली से विकासनगर, दिल्ली और घर वापसी

पिछली पोस्ट में आपने सातताल ट्रैकिंग और मुखबा भ्रमण के बारे में पढ़ा था। आज से हमारी वापसी की यात्रा शुरू होने वाली है। इस वापसी की यात्रा के लिए समय भी बहुत कम बचा है। आज 13 जून है, 14 जून को नीरज को ड्यूटी पर पहुँचना है। पिछले एक सप्ताह से हम बहुत आराम से घूम रहे है। कहीं कोई जल्दबाजी नही की। लेकिन अब थोड़ी जल्दी करना ही पड़ेगी। 
आँचल रेस्टोरेंट धराली

13 जून को सुबह 5 बज़े एक के बाद एक, तीनों उठ गए। 6.30 बजे चाय-नाश्ता भी हो गया। होटल रेस्टोरेंट पर दो दिन का खाने रहने का हिसाब नीरज कुमार ने चुकता कर दिया। जब यहाँ से रवानगी ली तो योजना थी कि शाम को विकासनगर पहुँच कर झा साहब के यहाँ आराम करेंगे, और रात को ही दिल्ली के लिए निकल जायंगे,सुबह-सुबह दिल्ली पहुँच जायँगे। खैर यह तो योजना थी,लेक़िन आगें देखों क्या होता है..?
धराली से बैगर नहाये ही चल दिये थे। जाट दम्पति की गंगनानी के गर्म पानी के कुंड में एक बार और डुबकी लगाने की इच्छा थी। तो तय हो गया कि गंगनानी में रुकना है। इस यात्रा में नीरज की स्पीड मेरे से तेज ही रही थी। हो भी क्यों ना ? कहाँ मेरी मरियल बुलेट और कहाँ बजाज 150 cc डिस्कवर, कोई बराबरी हो ही नहीं सकती। नीरज मेरे से 20 मिनीट पहले ही गंगनानी पहुँच गया। मोटरसाइकिल पर ही समान छोड़ हम तीनों गर्म पानी के कुंड की ओर चल दिये। मेरा नहाने का मन नही था। तो नीरज अकेला ही कुंड की ओर चल दिया 10 मिनीट तक तो वो गर्म पानी मे जाने से डरता रहा, और जब चले ही गया तो 20 मिनीट तक मगरमच्छ की तरह पानी मे ही रहा। वो नहा के तौलिये से बदन साफ़ कर ही रहा था कि एक अनजान शख्स कि आवाज़ आई - ओर जाटराम जी कैसे हो..?
यह आवाज नीरज के किसी प्रशंसक की थी। फेसबुक पर फ़ॉलो कर रहे थे, वे भी उत्तराखंड यात्रा कर रहे थे। संयोग से गंगनानी में आमना सामना भी हो गया।
संयोग से मिले नीरज के प्रशंसक महोदय..

जल्दी-जल्दी मेल-मिलाप कर हम 9.30 बज़े उत्तरकाशी की ओर चल दिये। बीच में कही रुकना तो था नही, विकासनगर पहुँचने की जल्दी जो थी। नतीज़न 11 बजे उत्तरकाशी भी पहुँच गए। अब उत्तरकाशी से निकल ही रहे है तो तिलक सोनी जी के रेस्टोरेंट में बिना दस्तक़ दिए कैसे का सकते थे,खैर दस्तक़ देने की जरूरत नही पड़ी सोनी जी बाहर ही खड़े थे। नीरज को समान पकड़ा कर में गाड़ी की छुटपुट सर्विस करवाने चल दिया,सोचा इग्निशन स्विच और गियर ऑइल टॉपअप करवा लेता हूं.. लेक़िन सर्विस सेंटर पर दोनों काम नही हो पाए। तो पेट्रोल फूल टैंक करवाते हुवे वापस द फ़ूड हैबिट कैफे पर आ गया। आते ही मीनू कार्ड में से कुछ बताने का फ़रमान मिल गया। आँख बंदकर के कार्ड पर उंगली रखी,आँख खोलकर देखा तो उंगली सेंडविच पर थी। नीरज बोलने लगा.. हउ..मेरे लिए भी यही बुलवा लो। जबकि दीप्ति ने व्हाइट सॉस पास्ता बुलवा लिया। लेक़िन जब हमारे सामने सेन्डविच आया तो, वो हमारी भुख के सामने ज़ीरे के समान था। सेंडविच कब खत्म हो गया पता भी नही लगा। नीरज कुमार मुझें ग़ुस्से से देखने लगा..और में मुस्कुराते हुवे कह रहा था..कोई ना.. एक एक पास्ता बुलवा लेते है। जब तक पास्ता नही आया नीरज की आँखे मुझ पर ही गड़ी रही। पास्ता आने के बाद मामला थोड़ा शांत हुवा।
जब दो दिन के बाद मोबाइल नेटवर्क एरिया में आये, तो यहाँ से जाने की किसी को जल्दी नही थी। मोबाइल चलाते चलाते 2 घंटे हो चुके थे। लेकिन जब याद आया कि विकासनगर आज ही पहुँचना है। तो उठना ही पड़ा।
दोपहर के 1.30 बज़े विकासनगर के लिए रवानगी ले ली। धरासू पार करने में ज़्यादा देर नही लगी। चिन्यालीसौड़ से दाएं ओर भेंटी की तरफ मुड़ गए। थोड़ा चले ही थे कि नीरज की गाड़ी के पिछले पहिये से हवा तेजी से निकलने लगी। आसपास देखा तो पंचर जोड़ने वाले की दुकान भी नही थी। खैर चिंता की कोई बात नही थी, ट्यूबलेस टॉयर का पंचर बनाना आसान काम है। समान तो था ही। पंचर जोड़ते हुवे उसका वीडियो बना रहा था, तो कहने लगा क्यों बे मजे ले रहे हो..मैंने कहा हाँ.. क्यों न ले मज़े।
यहाँ से आगे अब चढ़ाई ही चढ़ाई थी,बहुत ऊँचाई पर पहुँचने के बाद नीरज ने उंगली के इशारे से मुझें टिहरी डेम का क्षेत्र बताने की कोशिश की लेक़िन धुंध और जंगल मे लगी आग के धुंवे के कारण कुछ नही दिखा।
इधर हम पहाड़ो पर चढ़े जा रहे थे। उधर मेरी मरियल बुलेट भी अब थोड़े नख़रे करने लगी थी, उत्तरकाशी में ऑयल टॉपअप नही हो पाया तो टेफिट से तेज आवाज़ भी आ रही थी, लेक़िन थोड़ी देर बाद अपने आप बंद भी हो गई। इसके अलावा क्लच का तार भी टूटने की तैयारी में था। नीरज को पहले से कह दिया था कि तार कभी भी टूट सकता है,मज़े लेने के लिए तैयार रहना। बोलने लगा पूरा टूटने दे फिर रुकेंगे। जब टूट गया तो जोर से हॉर्न की पो-पो बजाकर संकेत दे दिया,तो वो भी रुक गया। जाट मेडम टेंशन में आ गई कि अब क्या
करेंगे ? लेक़िन मेरी गाड़ी की सीट के नीचे हमेशा एक क्लच केबल रखी रहती है, इसे हर 8-10 हजार किलोमीटर में बदलना ही होता है। और यह काम मे आसानी से कर भी लेता हूं..बाकी सहायता के लिए इंजीनियर दम्पति थे ही। 15 मिनीट में क्लच केबल बदल कर हम फिर चल पड़े। 
उत्तरकाशी के बाद से ही गर्मी लगना शुरू हो गई थी। रास्ते मे किसी बहुत ऊँचाई वाली जगह पर चाय का ब्रेक लिया,यहीं से बुराँश का शरबत भी ले लिया। आज पूरे दिन जौनसार के ग्रामीण क्षेत्र में चल रहे थे। अभी बहुत अधिक बारिश नही हुई थी,लेक़िन मानसून के बाद इस क्षेत्र की रंगत में चार चाँद लग जायँगे।विकासनगर पहुँचने की भागम-भाग में बस चले ही जा रहे थे। फोटोग्राफी भी बिल्कुल नही की।
जब थत्यूड़ पहुँचे तो शाम के 6 बज चुके थे। यहाँ चाय मैगी का नाश्ता करने रुक गये।विकासनगर अभी भी 80 किलोमीटर के लगभग बाक़ी था। यह निश्चित था कि अंधेरे मे भी गाड़ी चलाना पड़ेगी, इसका मुझें कोई पूर्व अनुभव नही है। लेक़िन नीरज साथ है तो डर की क्या बात। थत्यूड़ के बाद यमुना ब्रीज तक सड़क की स्थिति अच्छी नही थी,ऊपर से अंधेरा भी,खैर हम साथ-साथ, आराम से चल रहे थे। फिर भी लग रहा था बस अब जल्दी से विकासनगर के मुख्य मार्ग पर पहुँच जाए। 
जब यमुना ब्रीज के पास चाय का ब्रेक लिया तो थक कर चूर हो गए थे। लेक़िन अब विकासनगर  दूर नही था। कटापत्थर, डाकपत्थर रोड़ होते हुए ही तो पहुँचना था। और रात के 10.45 बजे पहुँच ही गये।
झा साहब सपरिवार हम तीनों की प्रतिक्षा कर रहे थे। और हम अपनी योजना से 6 घंटे की देरी से पहुँचे थे। थकान बहुत ज़्यादा थी, पहाड़ो पर, दिनभर में 250 किलोमीटर मोटरसाइकिल चलना कोई आसान काम नहीं है। झा साहब ने रात्रिभोज की तैयारी कर रखी थी। झा साहब की खातिरदारी की तारीफ़ क्या करूँ ? मित्रों के साथ जो खा ले लज़ीज ही होता है। भोजन के बाद आइस्क्रीम तो लगभग नींद में ही खाना पड़ी। उसके बाद बिस्तर पर जाने में कोई देर नही की।

14 जून 2018
आज भी सुबह 5 बजे के बाद ही उठाना पड़ा। अब हमें जल्दी से जल्दी दिल्ली पहुँचना था। दोपहर तक नीरज को ड्यूटी पर पहुँचना है। जल्दी जल्दी में मैने नहाना कैंसल कर दिया, वैसे भी रात को ही तो नहाया था। अभी तो आलस जिंदाबाद..नीरज कुमार ने खूब कहा नहा ले..रास्ते मे नींद आएगी लेकिन नही, तो नही।
इधर झा मेडम ने पोहा पार्टी की भी तैयारी कर रखी थी। सुबह 6.30 बजे सब साथ बैठकर पोहा पार्टी का आनंद ले रहे थे। फिर उसके बाद में अलविदा कहने का समय था। फिर मिलेंगे कहकर हम तीनों चल पड़े। इस यात्रा के बाद मुझें विकासनगर, झा साहब और शिव सरहदी जी से मिलन के लिए हमेशा याद रहेगा। धन्यवाद नीरज...
विकासनगर से पोंटासाहिब आने मे देर नही लगी। यहाँ से हम सहारनपुर होते हुवे भी दिल्ली जा सकते थे लेकिन ट्रैफिक के कारण करनाल,पानीपत मार्ग से ही जाना ठीक समझा।
वापसी की यात्रा में ना तो कोई फोटोग्राफी होती है ना ही कोई बड़े ब्रेक..बस चलते ही जाते है। छोटे-छोटे ब्रेक पेट्रोल पम्प पर ही ले रहे थे। मुँह धोते, पानी पीते और फिर चल पड़ते। मुझें आलस आ रहा था, सुबह नीरज ने बहुत बोला था..डॉक्टर नहा ले..लेक़िन मैने नहाया नही, ये उसी का नतीजा था। खैर अब मुँह धो-धो कर ही काम चला लेंगे। सुबह 10 बजे के करीब हम लाडवा पहुँच गए, चाय समोसे का भोग लगाकर कुछ सुस्ती भगाई। यहाँ बैठे थे तभी हमारे मित्र सचिन कुमार (पानीपत) का फ़ोन आ गया, उन्हें स्थिति बताई की करनाल के पास है..सचिन कुमार से आदेश मिला कि पानीपत टोल नाके पर रुकते हुवे जाना। हाँ भाई ठीक है..नीरज कुमार वैसे तो बहुत अच्छा है। लेकिन कभी कभी नख़रे भी करता है। कहने लगा मेरी तो ड्यूटी है..तुम मिलते रहना और आ जाना दिल्ली। वैसे में ऐसा कर भी सकता था। लेकिन पहली बात कि पूरी यात्रा में साथ-साथ रहे और आख़री के 150 किलोमीटर में क्यों अलग रहे। दूसरी बात सचिन कुमार पहले नीरज का मित्र है..और मेरी मित्रता उनसे नीरज के कारण हुई है, तो ऐसे मेरा अकेला मिलना व्यहारिक तौर पर गलत है, जबकि सचिन और नीरज का बढ़िया याराना रहा है..नीरज अभी हाँ-हाँ, ना-ना कर रहा है अब देखो,पानीपत टोल नाके पर रुकता है या नही।
लाडवा से हम सीधे कुरुक्षेत्र आ गए, कुरुक्षेत्र के बाद तो सिक्स लेन हाइवे मिलना ही था। सिक्स लेन पर 80-90 की स्पीड पर गाड़ी कब चलने लगती है पता ही नही लगता। थोड़ी देर में ही करनाल पार हो गए। नीरज मेरे से आगे ही चल रहा था। लेक़िन में 80-90 की स्पीड से चल रहा हु फिर भी उसकी डिस्कवर कही नजर नही आ रही..इसलिए कहता हूं,मेरी बूलेट बिल्कुल मरियल है, ऊपर से रोज के नए नए केस करती है वो अलग। अभी ही पानीपत के पहले अचानक बुलेट कुछ पार्ट्स गिरने की आवाज़ आई..देखा तो बैटरी का कवर गिर गया था, 80-90 की स्पीड में अचानक रुक भी नही सकता था। करीब 500 मीटर से वापस आकर कवर ढूंढा तो मिल गया। इसका लॉक टूट गया था, उसे कपड़े से बांध दिया। इंदौर तक ऐसे ही ले जाऊंगा।
पानीपत टोल नाका पहुँच कर सबसे पहले नीरज को खोजा.. वो कही नजर नही आया। मुझे पूरा यकीन था कि वह मुझे अकेला छोड़ दिल्ली भाग गया होगा। फिर भी मैंने फोन लगा लिया..खड़ूस ने फ़ोन भी नही उठाया। फिर वापस इधर उधर देखा तो नीरज कुमार मेरे पीछे से प्रकट हुवे। देखते ही मैंने कहाँ - अबे तू पीछे कैसे रह गया ? मैंने तो कहीं तुझे ओवरटेक भी नही किया ?
नीरज ने अपने अंदाज में कहा - में तो दो बार पेट्रोल पम्प पर रुक गया था..।
अभी दिन के 12 बज़े, हमें पानीपत की गर्मी बहुत परेशान कर रही थी, पेड़ की छांव में तीनों बैठ गए, बैठकर सचिन कुमार को फ़ोन लगाया..सचिन ने 5 मिनीट में आने को कहा..नीरज कहने लगा वो 15 मिनीट से पहले नही आने वाला..यकीन हो गया कि दोनों एक दूजे से भलिभांति परिचित है..खैर 15 मिनीट  बाद सचिन कुमार, देहरादून वाले अंशुल डोभाल जी के साथ हमारे सामने आ ही गये। सब एक दूजे से प्रेम से मिले..हमारे मेजबान अपने साथ थम्सअप भी लाये थे। तपती दोपहर में इसकी बहुत जरूरत थी। बतियाते बतियाते 30 मिनीट होने वाले थे। सचिन कुमार के साथ अंशुल डोभाल जी से मिलना बोनस था। नीरज और सचिन को बतियाते देख मुझें बहुत ख़ुशी हो रही थी।
खैर यहाँ बहुत देर रुक नही सकते थे। एक दूजे को फिर मिलेंगे कह कर हमारी दिल्ली यात्रा फिर से शुरू हो गई। इस बार दोनों साथ साथ ही चल रहे थे। जब थम्सअप की ख़ुमारी खत्म हुई तो एक जगह रायता पार्टी कर ली और रायते की ख़ुमारी उतरते ही गन्ना रस को जिंदाबाद किया। उसके बाद दिल्ली पहुँचने में कहा देर लगती है। 2.40 बजे हम शास्त्री पार्क पहुँच ही गये, गाड़ी से समान खोलकर फ़्लेट पर पहुँचे तो नीरज और में शक्तिहीन से थे, दिल्ली की उमस ने बुरा हाल कर रखा था। जाते ही कूलर वाले कमरे में पड़ गया। दीप्ति ने अपने अनुज, हर्षित को कह कर पहले से ही शाही पनीर वाला भोजन बुलवा लिया था। नहाकर तीनों ने साथ बैठकर भोजन किया और फिर नीरज ड्यूटी चले गया। जाते जाते कह गया..यहीं सोये पड़े रहना इंदौर जाने की जल्दी मत मचाना, शाम को मिलते है। मेरी भी हालत खराब थी, चुपचाप सो गया।  
शाम को नीरज वापस आया तभी होश सम्हाला। उसके आते ही बेहद जरूरी काम(डेटा का आदानप्रदान) किया, इसी कारण मे पानीपत-रेवाड़ी रूट छोड़कर दिल्ली आया था। इसके बाद सब साथ बैठकर विकासनगर की लीची छिलने बैठ गए। साथ मे पंचायत का आयोजन भी चल ही रहा था। यात्रा ख़र्चे की बात करते हुवे नीरज ने दो मिनीट मे सब टोटल कर लिया, और उसे 3 से विभाजित कर के मुझें कह दिया..डॉक्टर 3600 रु. का ख़र्च
आया है एक व्यक्ति का। तूने 5000 दिए थे ना, ये ले तेरे बाक़ी के रूपए, मैंने देखा तो उसने 1500 रु.वापस किये थे, मैंने कहा-ये कैसा हिसाब है,पुस्तक के 200 रु भी नही लिए तूने और उल्टा 100 रु ज्यादा दे रहा है। लेक़िन उससे जितना मुश्किल है..300 रु उसने, उसकी पूर्वोत्तर में रख कर दे ही दिए।
ये नीरज भी ना, खाने और खिलाने का बेहद शौकीन व्यक्ति है। लीची से मन भरते ही पिज्ज़ा ऑर्डर करने मे लग गया। 4 तरह के  पिज्ज़ा और साथ में बर्गर आने में देर नही लगी। पंचायत में अब इधर उधर की बातों के साथ पिज्ज़ा-बर्गर भी शामिल हो गए। डेटा ट्रांसफर का काम भी ख़त्म हो गया था। मतलब अब में अपनी इंदौर वापसी की यात्रा के बारे में सोच सकता था। अभी तो रात के 10 बज रहे है..नीरज ने पूछा- क्या योजना है तुम्हारी ? मैंने कहा - रात को 12 के बाद निकल जाता हूं..ट्रैफिक भी नही मिलेगा। नीरज ने इस योजना को ख़ारिज कर दिया..कहने लगा, अभी सो जाव, बिना अलार्म लगाए..जब नींद खुले तब चले जाना, जाने से पहले भरपूर नींद लो। नीरज की बातें सही थी, उन्हें मान कर मे भी चुपचाप सो गया, वहीं अपने कूलर वाले कमरे में। फिर भी अब इंदौर पहुँचेने की जल्दी तो थी ही, तड़के 3 बजे ही नींद खुल गई।

15 जून 2018

उठते ही सबसे पहले नहा लिया। इतने में दीप्ति की खटपट भी शुरू हो गई थी। नहाया जब तक दूध का ग्लास तैयार था। बीकानेरी नमकीन का पैकेट भी बेग में रखा दिया गया था। सुबह चार बजे सारा सामान उठाकर नीचे आने लगा तो नीरज भी जाग गया था, मेरे साथ नीरज-दीप्ति भी नीचे आ गए। गाड़ी पर बैग ठीक से बांधा और नीरज से गुड़गांव के रास्ते की जानकारी ले ली।
पूरे 10 दिन से हम तीनों साथ रहे..एक यादगार यात्रा के सहभागी बनें..इन दस दिनों की खट्ठी-मीठी यादें लिए अलविदा कहने में कितनी देर लगती है ? बस अपनी फटफटी का बटन दबाया..और मुस्कुराते हुवे.."चलों एक बार फिर से अज़नबी बन जाये..." गाना गुनगुनाते हुवे चल पड़ा 930 किलोमीटर दूर इंदौर की ओर।
शास्त्री पार्क से निकलते ही कान में हैंडफ़्री लगाकर मोबाइल पर गूगल मैप नेविगेशन शुरू कर लिया, ट्रैफिक बिल्कुल कम था। नतीज़न गुड़गांव पहुँचने में 60 मिनीट ही लगे। गूगल नेविगेशन का काम अब ख़त्म हो चुका था।दिल्ली से चलते ही हर एक घंटे में 5 मिनीट आराम करने और रिस्की ओवर टेकिंग न करने की कसम खा ली थी। उसे भी निभा रहा था। सुबह सुबह बढ़िया गति से चल सकता था। मौसम भी ठीक है। दोपहर में इतनी गति से नही चल पाऊंगा, उसकी कसर भी सुबह ही पूरी कर ली। सुबह 9.30 बज़े जब जयपुर पार कर रहा था तो धुप और गर्मी पूरे रंग में थी। डिकेथलॉन शो रूम के सामने गन्ने का ठेला देखकर रुक गया। 20 मिनीट बढ़िया आराम किया। उसके बाद अगला ब्रेक जयपुर से 70 किलोमीटर दूर कही लिया, और इस बार ढ़ाबे की खाट पर बहुत देर पड़े रहा,उसके बाद आलू पराठे के साथ छाछ बुलवा ली। राजस्थान में जून की गर्मी का सामना मोटरसाइकिल चलाते हुवे करना,बहुत दूभर होता है। छाछ/गन्ने का रस ही पूरे दिन का सहारा बनगे आज तो। किसी तरह हिम्मत कर के फिर से फटफटी का बटन दबाकर निकल पड़ा। पूरा शरीर ढका हुआ था, फिर भी गर्मी तो गर्मी ही है, और अब तो साथ में रेगिस्तानी की रेतीली हवा भी शुरू हो गई थी। किशनगढ़ से मुझें NH8 का साथ छोड़ नसीराबाद के लिए दाएं मुड़ना था। रुकते-रुकाते 1 बज़े के करीब नसीराबाद आ गया। यहाँ फिर से लंबा ब्रेक लिया,कुछ खाने का मन नही था, तो बस चाय पी कर खाट पर पड़ा रहा। इस तरफ अभी 4 लेन रोड़ को 6 लेन में तब्दील करने का कार्य जारी है, तो बहुत आराम से गाड़ी चला रहा था। आज दिल्ली से निकलते समय मैंने एक गलती कर दी, वो यह कि बाइकिंग के दौरान मेरी आदत जींस पहनने की है। लेकिन आज प्रयोग के तौर पर पतला  लोवर पहन लिया। इससे बैठने में बहुत परेशानी हो रही थी। खैर अब गलती की है तो इंदौर तक ही झेलूँगा। 
नसीराबाद के बाद भी अपने पैटर्न से चलते रहा। शाम के 5.30 बज़े चित्तोड़ पार कर चुका था। अब यहाँ से इंदौर 350 किलोमीटर के आसपास ही तो है। रात तक आराम से पहुँच जाऊँगा। एक होटल में तरोताजा होकर चाय और आलू पराठे बुलवा लिए। फिर से चल पड़ा, अब शाम भी हो गई थी, गर्मी भी कुछ कम हो गई थी, अब रफ़्तार भी थोड़ी बड़ा सकता था। नीमच तक बढ़िया रफ़्तार से आ गया। तब तक शाम के 7.30 बज़ चुके थे। थोड़ी देर बाद अंधेरा भी हो गया। जब गाड़ी की बत्ती चालू की तो पता लगा हाई बीम लाइट नही जल रही है, तो लो बीम से ही काम चलाना पड़ रहा था। जब दलौदा क्रॉस किया तो दिल्ली से निकले 17 घंटे से भी ज्यादा हो चुके थे, इस दौरान 750 किलोमीटर के आसपास पार हो गया था। निश्चित तौर पर शरीर थका हुआ था,मन हो रहा था कि दलौदा में ही छोटी बहन के घर पर थोड़ा आराम करते हुवे इंदौर जाऊ, लेक़िन एक बात यह भी थी कि अगर अभी रात के 9 बजे अगर वहाँ जाता हूं, तो वहीं रात रुकना पड़ेगा। और इंदौर अब यहाँ से है ही कितनी दूर ? 200 किलोमीटर यानि ज्यादा से ज्यादा 4 घंटे। दलौदा बिना रुके ही आगे बढ़ गया। ना रुकने के कारण बाद में जीजा ने ख़ूब फटकार लगाई।
जावरा के बाद नागदा होते हुवे उज्जैन तक का 100 किलोमीटर रोड़ 2 लेन है। इधर हाई बीम लाइट की कमी खूब खली। कार के पीछे चलकर इस कमी को किसी तरह पूरा किया। रात 11 बजे उज्जैन पहुँच गया। शहर में आज ईद की धूम मची हुई थी। उज्जैन से इंदौर 55 किलोमीटर ही तो रह जाता है। लेक़िन इस 55 किलोमीटर में सब कुछ याद आ गया,कारण था शरीर की थकान,तशरीफ की पीड़ा..
रात 12 के बाद घर पहुँच गया। मम्मी पापा अभी भी जग रहे थे। अंदर पहुँचा तो वो मेरा रूपरंग देख कर दंग रह गए। एक ही दिन में 930 किलोमीटर मोटरसाइकिल चला लेना कोई आसान काम तो है नही, उसकी थकान चहरे पर थी,बाकी राजस्थान की गर्मी से चेहरा और आँखे जल गई थी। जाते ही नहाकर बिना कुछ खाये सो गया।
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अब मेरी यात्रा पूर्ण होती है।
साथ देने के लिए सभी का धन्यवाद।
कोशिश है कि लेखन आगे भी जारी रहे...
अब कुछ फ़ोटो देखिए।



होटल के कमरे से सुबह-सुबह..









सुनसान राहें..





सूरज की पहली किरणें..




उत्तरकाशी के पहले..

बम बम भोले..




अब कुछ मोबाइल फोटोग्राफ इनका साइज़ छोटा ही है..
द फूड हैबिट - उत्तरकाशी


थत्यूड़ में नेटवर्क मिलते ही काम काज शुरू..


झा साहब के यहाँ.. 

पानीपत में सचिन और नीरज..

शास्त्री पार्क पहुँच कर हमारी हालत..






जयपुर में..












फिर मिलेंगे किसी नई जगह के वृत्तांत के साथ...