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Monday, 18 June 2018

कच्छ-सफ़ेद रण मोटरसाइकिल यात्रा भाग-2


जैसा की पहली पोस्ट मे आपने पढ़ा कि में ओर गिरधर,कच्छ यात्रा की शुरुवात इंदौर से 15 जनवरी 2015 को सुबह 5.30 बजे कर चुके थे। दोपहर के 3 बजे हम 450 कि.मी की दुरी तय कर अहमदाबाद पहुँच गये थे।
अहमदाबाद से साणंद तक की 15 कि.मी की दुरी हम 45 मिनीट में कर पाये,यहाँ पहुँचते पहुँचते समय 3.45 हो गया था।
सुबह से अब तक हम लगातार चलते जा रहे थे,बिना कही चाय-नाश्ता किये,गिरधर भाई भुखे नहीं रह पाते है,और में उनके विपरीत लम्बी बाइक यात्रा में खाना पसंद नहीं करता हु,फिर भी साथी की खातिर मैने साणंद में खाना की जगह खोजना शुरू किया,इसबीच एक पानीपुरी का स्टाल देख मेरा मन किया कि गुजरात की पानीपुरी का स्वाद लिया जाय,स्वाद बुरा तो नहीं था,पर इंदौर की तुलना में काफी फीका था।
गिरधर का मन पूर्ण भोजन करने का ही था,तो हम साणंद में रेस्टोरेंट खोज रहे थे,पूरा साणंद पार हो गया पर रेस्टोरेंट या भोजनालय नहीं मिला,कही दाबेली मिली तो कही पाव भाजी...
बहुत पुछने पर किसी ने बताय की बायपास के पास मुनिश्री आश्रम चले जाइये,वहा भी गये तो पता लगा शाम 6 बजे भोजनालय शुरू होगा।
थककर गिरधर नाश्ता करने पर ही राजी हो गया,आश्रम के सामने ही रेस्टोरेंट था,कचोड़ी,समौसे से लेकर पूरा गुजरती नाश्ता मतलब गोटे,फाफड़ा उपलब्ध था लेकिन हमने कचोड़ी ही ली,उसका स्वाद भी बहुत अच्छा नहीं था,अब इन्दोरियो को इंदौर के अलावा और कही की कचोड़ी इतनी आसानी से कहा आना थी,इसीलिए एक कचोड़ी के बाद कुछ नहीं लिया।
अब यहाँ से हमे पहले वीरमगाम फिर धांगध्रा की और जाना था,शाम के 4.15 बजे हम साणंद से रवाना हुवे।
रोड स्थिति के बारे मे फिर से बता देता हु,हम एक बार फिर से फोर लेन रोड पर थे,ट्रैफिक भी बहुत कम था,तो 80 की स्पीड से आगे बढ़ते रहे।
बहुत ही कम समय मे वीरमगाम पहुँच गये,यही पेट्रोल फुल टैंक करवाया,इंदौर से पेट्रोल फुल टैंक करवाया था,और अहमदाबाद के बाद रिज़र्व लगा था,माइलेज 55 के करीब रहा,जोकि बुलेट के लिहाज से आदर्श है,एक बात और,मध्यप्रदेश की तुलना मे गुजरात में पेट्रोल 5 रुपये सस्ता था,तो थोडा खुश होना तो बनता था,यही तो अंतर होता है एक विकसित और विकासशील राज्य मे।
साणंद से गाड़ी गिरधर चला रहा था,मुझे पीछे बैठकर में नज़ारे देख रहा था,इसीबीच सड़क किनारे ढ़ाबे नजर आये,गिरधर को भी बताया,उसे भी पछतावा हो रहा था कि,साणंद की कचोड़ी से बेहतर तो यही खाना खा लेते।
खेर...
वीरमगाम के बाद हम धांगध्रा पहुँचे,यहाँ पहुँचने पर समय 6.10 हो रहा था,पर दिन अभी ढला नहीं था,क्योकि हम भारत के सबसे पश्चिमी छोर की और थे,इस ओर सूर्य अस्त देर से होता है,मध्य भाग कि तुलना मे।
इस तरह इंदौर से प्रस्थान किये हमे 11 घण्टे हो चुके थे,और करीब 550 कि.मी दुरी तय कर चुके थे।
धांगध्रा बायपास पर ही 10 मिनीट रूककर,गाड़ी का एक निरीक्षण किया और हवा चेक करवाई,रुके ही थे तो चाय की चुस्की भी ले ली।
औऱ आगे बढ़ने की तैयारी कर ली,भुज यहाँ से 220 कि.मी और था,भुज तो नहीं पर करीब 100-150 कि.मी और जा सकते थे ।
पर यही पर गिरधर भाई कहने लगे,अब बस..यही रूम लें लेते है,अंधेरा भी होने वाला है, छोटा सा क़स्बा हे...
 मैने एक बार फिर से समय देखा...
अभी शाम के 7 भी नहीं बजे थे,हम देश के पश्चितम हिस्से की और थे,अभी सूर्य देव ने भी अलविदा नहीं कहा था,मेने कहा नहीं अभी और चलते है...
गिरधर ने थोड़ी ना नकुर की लेकिन फिर बैठ गया...
यहाँ से आगे भी बेगर ट्रैफिक के फोरलेन हाइवे था,तो 80 किलो मीटर प्रति घंटे की गति आराम से बनी हुई थी,करीब 1 घंटे ने ही हम मालिया पहुँच गए,रुकने के लिए रूम का पूछा,तो राहगीर ने हाइवे पर ही कई होटल,लॉज दिखा दिए,पहले लॉज में ही 300 रुपए में बढ़िया कमरा मिल गया।
नीचे ही रेस्टोरेंट था,बहुत थक चुके थे,पुरे दिन से मोटरसाइकिल पर थे,650 किलोमीटर के लगभग दुरी तय की थी आज...
तो  खाना भी कमरे में ही बुलवाया,शाही पनीर,दाल तड़का और चपाती, 280 का बिल बना,खाना खाते ही चिर निद्रा में लीन हो गये।
सुबह  उठते ही कच्छ के रण का बचा हुवा सफ़र शुरू करेंगे।
रात को कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।
लेकिन हाइवे पर ट्रको की आवाजाही के कारण नींद जल्दी खुल भी गई,वैसे तो अलार्म लगा के सोये थे,लेकिन ट्रको की पो पो ने उसे बजने ही नहीं दिया।
5 बजे के करीब नींद खुल गई,गर्मपानी का हीटर चालू कर के नीचे रेस्टोरेंट में चाय पी और गिरधर को भी उठा दिया।
दोनों तैयार होकर नीचे पहुँचे तब तक सुबह के 7 बज चुके थे,पर हम मध्यप्रदेश निवासी अब भी अँधेरा देख कर आश्चर्यचकित थे,कल शाम को देर तक अँधेरा नहीं हुवा और अब सुबह 7 तक उजाला नहीं हुवा,देश का पश्चितम हिस्सा है ऐसा होना जायज़ है, वैसे देश के पूर्वोत्तम हिस्से गवहाटी में इसका उल्टा होता है, सुबह उजाला जल्दी हो जाता है, और अँधेरा भी जल्दी हो जाता है।इससे यहाँ की दिनचर्या भी होती ही होगी,इसलिये देश के इन दोनों हिस्सों का टाइम जोन अलग अलग होना चाहिए,खेर हम दोनों यह सोचते 2 मालिया से हमारी फटफटी से आगे निकल चुके थे।
मालिया के थोडा आगे ही नमक के खेत मिलना शुरू हो चुके थे,देश के जरूरत का नमक बड़ा हिस्सा यहाँ तैयार होता है।
आज के लिए हम तय कर चुके थे की बारी बारी से दोनों 100-100 किलोमीटर फटफटी चलायंगे।
गिरधर को ठण्ड सहन नहीं होती है, उसे गुजरात की ठण्ड भी ज्यादा लैह रही थी,इसलिए सुबह शुरुआत मेने की और भचाऊ पहुचने के बाद गाड़ी उसके हवाले कर दी।
भचाऊ के बाद रोड की स्थिति कल जैसी तो नहीं थी,लेकिन बहुत बुरी भी नहीं थी,ठीकठाक 2 लेंन रोड था।
भुज पहुँचते 2 हमे 10 बज चुके थे।
वेसे तो भुज में भी बहुत कुछ हे देखने को,लेकिन इतना समय नहीं था,तो हम रुके ही नहीं सीधा कच्छ का रास्ता पकड़ लिया।
मंजिल कच्छ का सफ़ेद रण और रेगिस्तान ही था।
भुज के बाद ही आसपास का परिदृश्य बदलने लगा था,रेगिस्तान की शुरुआत हो चुकी थी,इस परिदृश्य में तीर के सामान सीधी सड़क पर हमारी फटफटी भागी जा रही थी।
कब हम देश के सबसे बड़े जिले कच्छ में प्रवेश कर गए पता ही नहीं चला।
स्वागत द्वार बाह फैलाये हमारी प्रतीक्षा कर रहा था,हमने भी उस द्वार को निराश नहीं किया,वहीँ मोटरसाइकिल रोकी और इस प्रथम मिलन की बहुत सारी फोटो भी खिची।
बस अब तो जल्दी थी सफेद रण में पहुँचने की,गिरधर ने एक व्यक्ति से पूछा भाई कच्छ का रास्ता कौन सा है,उसने कहा भाई यह कच्छ ही है, आप कहाँ जावेगें, फिर मुझे याद आया अरे इससे सफ़ेद रण का पूछो।
फिर पूछा तो उसने रास्ता बताया।
दोपहर के 12 बजे हम सफ़ेद रण या धुरडो पहुँच गए।
कच्छ का सफ़ेद रण अब हमसे ज्यादा दूर नहीं था,लेकिन वहाँ तक पहुँचने के लिए कुछ औपचारिकता पूरी करनी थी।
गुजरात टूरिज़्म के कार्यालय गए और वहाँ से हम दोनों की और फटफटी का प्रवेश शुल्क जमा किया और पावती लेली,होगई औपचारिकता पूरी इस हेतु क्लर्क ने गाड़ी का RC कार्ड और हम दोनों के परिचय पत्र मांगे,कुल शुल्क 125 रुपये लगा।
यहाँ से आगे बढे तो टेंट सिटी थी,सुबह 7 बजे हम लोग मालिया से निकले थे,और अब दोपहर के 1 बज चुके थे,कुछ खाया नहीं था,टेंट सिटी में लगे स्टाल में जा पहुँचे, और कच्छ की प्रसिद्ध दाबेली पर टूट पड़े,क्या गजब का स्वाद था,स्टॉल संचालन वही के जयेश भाई कर रहे थे,उनसे भी अच्छा परिचय हो गया,बातों से और दाबेली से पेट और मन दोनों तृप्त होगये।
टेंट सिटी से सफ़ेद रण की दुरी करीब 5 किलोमीटर थी,उधर ही मोटरसाइकिल दौड़ा दी।
यहाँ से पाकिस्तान सीमा दूर नहीं है, इसकारण बी. एस. एफ का पेहरा व जाँच सघन है।
बी.एस.एफ के जवानो से राम राम की और आगे बढ़ गए,अब हमे कच्छ का सफ़ेद रण अपनी झलक दिखा रहा था।
पार्किंग में पहुँच कर गाड़ी पार्क की,हमारी गाड़ी के पास ही एक और गाड़ी थी,दिल्ली की,उस पर बेग भी बंधा हुवा था,लगता हे कोई अकेला ही आया है, मतलब हम अकेले सरफिरे नहीं थे।
इंदौर से 1100 किलोमीटर दूर मोटरसाइकिल चलाकर जिस सफ़ेद रेगिस्तान के लिए हम आये थे वह सामने था,पार्किंग से करीब 1 किलोमीटर की दुरी पैदल तय की,धीरे 2 हम आगे बढ़ते गए शुरुवात में रण का मैदान कुछ गिला था,जैसे 2 आगे बढ़ते गए,जमीनी परिदृश्य ठोस और सफ़ेद होता गया,अब रोड भी ख़त्म हुई और हमने अपना पहला कदम रख दिया,कच्छ के सफ़ेद रण में,दोनों के चहरे ख़ुशी से खिलखिला रहे थे,हम दोनों ने यात्रा का एक पड़ाव पूरा होने की बधाई दी,और खो गए कच्छ की प्राकृतिक सुंदरता में,पूर्णतः प्राकृतिक,मानव की निर्माण शक्ति का कोई हस्तक्षेप नहीं,जहाँ तक नजऱ जा रही थी,वहाँ तक पूरा परिदृश्य सफ़ेद और अनंत दुरी पर यह परिदृश्य नीले आसमान से मिल रहा था,अद्भुत नजारा था,जिसकी सुंदरता को शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता।
देखा जाय तो,सफ़ेद रण में दो दुनिया बसी हुई थी,एक दुनिया थी मानव निर्मित टेंट सिटी,यहाँ खाने के पकवानों से लेकर हस्तशिल्प व हस्तनिर्मित कारीगरी वाले वस्रों की दुकानें, और ठहरने के लिए स्विस टेंट से लेकर ए.सी टेंट,जितना पैसा खर्च करो,उतनी ज्यादा सुविधा प्रदान कI जा रही थी इस दुनिया में,लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा था,मानव ने इतनी सुन्दर प्राकृतिक जगह का अतिक्रमण कर लिया है।
एक दुनिया और थी,वो थी कच्छ का सफ़ेद रण,जो की प्राकृतिक प्रेमियो के लिये एक अद्वितीय जगह थी।
हम तो खो से गए थे,इस जगह की सुन्दरता में।
फिर दौर शुरू हुवा फोटोग्राफी का जो निरंतर चलता रहा,कब 4 बज गए पता नहीं चला,बड़ी तमन्ना थी,कि रात यही बिताई जाय,लेकिन टेंट सिटी के रेट सुनकर दोनों ने ठान लिया की यहाँ नहीं रुकना।
कालाडूंगर की दुरी यहाँ से 50 किलोमीटर थी,वहाँ का सूर्यास्त काफी प्रसिद्ध है,पार्किंग में गए और गाड़ी लेकर फिर चल पड़े...कालाडूंगर..
शाम को 6 बजे पहुँच गये कालाडूंगर,यहाँ का दत्तात्रेय मंदिर और सनसेट काफी प्रसिद्ध है।
यही पर मुलाकात हुई एक और मोटरसाइकिल सवार से,जिसकी मोटरसाइकिल हमने कच्छ के रण में देखी थी।
शाम गहरा रही थी.. सूर्यास्त का समय था.. सबसे पहला काम रूम की व्यवस्था करना था, क्योंकि वहाँ केवल एक ही धर्मशाला थी..
तो मैं और मेरा मित्र गिरधर रूम के लिए धर्मशाला कक्ष में गए और सारी जानकारी लेने लगे... तभी वहाँ एक व्यक्ति और पहुँचा... और कहने लगा...
व्यक्ति-मुझे एक रूम चाहिए..
धर्मशाला मैनेजर- हाँ मिल जाएगा.. आपका नाम ? कहां से आये हैं...
मोटरसाइकिल वाला व्यक्ति- दिल्ली से आया हूं.. नाम नीरज जाट है ।
मैनेजर-ठीक है.. 750 का है रूम... चलेगा क्या?
नीरज- वैसे मैं अकेला ही हूं कुछ कम वाला है क्या...?
मैनेजर- हां फिर 350 वाला है?
नीरज- ठीक है। मैं रूम देख लेता हूं..
और वह व्यक्ति मतलब नीरज बाहर जाने लगा.. तभी मैं और मेरा मित्र भी बाहर आये और उस व्यक्ति मतलब नीरज से औपचारिक परिचय करते हुए... 350 वाले रूम को मिलकर लेने का प्रस्ताव रखा... और नीरज ने बेझिझक तुरंत हाँ कह दी..
यही वह पल था जब एक विशिष्ट घुमक्कड़ से परिचय प्रारंभ शुरू हुआ...
सबसे पहले हमने दोनों गाड़ियां पार्क की... नीरज की मोटरसायकल पर मेरी नजर पड़ते ही... मैंने उन्हें बताया... तुम्हारी गाडी तो हमने सफ़ेद रण पर भी देखी थी...
आगे बढ़ते हुए सूर्यास्त देखने जाने लगे..
जहां हम सूर्यास्त देखने के लिए भागदौड़ लगा रहे थे.. वहीं नीरज आराम शांत भाव से आगे बढ़ रहा था...
सूर्यास्त जल्द भी हो गया... और वहां तेज हवा चलने लगी.. पहले पहले तो मजा आ रहा था.. पर जल्दी ही हम दोनों मालवियों को ठण्ड लगने लगी.. पर नीरज आराम से आनंद ले रहा था...
नीरज का शांत भाव देख कर गिरधर कहने लगा.. इतना शांत और सीधा जाट पहली बार देखा है..
....
फिर मैंने उनसे पूछा पहली बाइक ट्रिप है..?
वो कहने लगे हाँ..
फिर मैंने बातों बातों में कहा- मुझे तो मोटरसायकल से लद्दाख जाना है... कभी आप गए हो क्या वहाँ..
नीरज- हाँ दो बार गया हूँ... पर मोटरसायकल से नहीं
मैने कहा- तो फिर बस से गए होंगे तब तो..
नीरज- नहीं एक बार ट्रेकिंग करने और एक बार सायकल से...
मैं आश्चर्य भाव से उसे देखने लग गया...
इसी पल से उस्की घुमक्कड़ी से भी साक्षात्कार शुरू हुआ.. जोकि अनवरत जारी है...
अब रात गहराना शुरू हो गई थी..
हम तीनों वापस कमरे की और जाने लगे..
मैंने फिर नीरज से पूछा- तुम्हे यह जगह पसंद आई या सफ़ेद रण?
नीरज ने कहा- नहीं ऐसा कुछ होता ही नहीं है... कोई भी स्थान या तो अच्छा होता है.. या बहुत ही अच्छा होता है.. बुरा तो कुछ नहीं होता है..
नीरज का जवाब बहुत ही प्रभावी था...
मेरे मन में धारणा बन रही थी कि यह व्यक्ति असाधारण है...
लेकिन उसका व्यवहार बहुत ही साधारण और सरल है..
उसकी ओर मेरा आकर्षण और बढ़ गया..
कमरे तक पहुँचे.. कुछ देर बाद खाना खाया.. और टहलने लगे..
अगले दिन के कार्यक्रम की चर्चा होने पर,आगे के कार्यक्रम के लिए नीरज ने प्रस्ताव दिया कि कल से हम लोग साथ में घूमेंगे.. आप भी अकेले हैं.. सभी के लिए ठीक रहेगा...
प्रस्ताव हम दोनों मित्रों को सहर्ष स्वीकार था..
अगली सुबह नीरज के साथ में घुमक्कड़ी शुरू हुई...
हमें कुछ नहीं करना था.. केवल उनके पीछे चलना था.. उन्हें हर रास्ते की.. हर जगह की जानकारी थी.. तो हम दोनों ही निश्चिन्त थे..
मन में सोच लिया था... घुमाओ भाई जहां घूमना चाहो.. कहीं भी घूम लेंगे..
यहाँ से अगले दो दिनों तक साथ ही घूमे...
नीरज को हर छोटे बड़े सड़क मार्ग और आसपास के भूगोल की अच्छी जानकारी थी...
मांडवी से हम तीनों दोस्तों ने वापसी का सफ़र शुरू किया...
भचाऊ पहुँचने पर इस विशिष्ट घुमक्कड़ से फिर मिलेंगे... कह कर अलविदा हो गए...
हम इंदौर के लिए.. और नीरज धौलावीरा के लिए रवाना हो गया...
समाप्त।



हो गई शुरुआत रेगिस्तान की...

भुगना-मिट्टी के घर...

फ़ीस काउण्टर

पहुँच गये कच्छ...

मेरा साथी,में,और हमारी सारथी...








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