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Wednesday, 27 June 2018

उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-2 दिल्ली के दिलवालों के साथ-ग़ुमनाम फॉसिल पार्क और गुलज़ार विकास नगर



भाग-2

05 जून 2018

इंदौर से दिल्ली की यात्रा की थकान लिए जब कूलर के सामने सोया तो,3 घंटे भी नही सो पाया,शाम 4 बज़े के करीब ही नींद खुल गई।
नीरज ड्यूटी से अभी भी नही आया था,हमारी बात दिल्ली से आज ही शाम को निकलने की हुई थी,दिल्ली से विकासनगर (देहरादून) आज रात तक पहुँच जाने का प्लान था।
थोड़ी देर बाद सामने दरवाज़े में थोड़ी हलचल हुई,मुझे लगा नीरज आ गया...लेकिन वो नीरज नही धीरज था..धीरज,नीरज का छोटा भाई है,मुझे देखते ही "और क्या हालचाल है..डॉक्टर साहब..खैरियत पूछी।" 
खैर इससे पहले हम एक-दूसरे से मिले नही थे..फेसबुक पर दोस्त भी नही थे,लेकिन फिर भी देखते ही बातें शुरू हो गई..धीरज का स्वभाव भी नीरज की तरह सहज़ सरल ही है।

थोड़ी देर बाद दीप्ति ने खाने की व्यवस्था कर दी..खाने में गरमा गरम चपाती,स्वादिष्ट मूंगदाल,बून्दी रायता,इमारती और सलाद था..
स्वाद के चक्कर मे खाना टारगेट से ज्यादा ही हो गया...
खाने के बाद धीरज से फिर से संवाद जारी हो गए,धीरज कुमार भारतीय रेलवे में असिस्टेंट लोको पायलट है..अभी अभी दिल्ली मुख्यालय मे ट्रांसफर हुवा है,इससे पहले राजस्थान के जैसलमेर के पास,किसी बहुत गर्म जगह पर ड्यूटी कर रहा था,इसके साथ ही वह बहुत अच्छा एथलीट भी है..नीचे ग्राउंड में रनिंग वगैरह करने जा रहा था तो मुझे भी चलने को कह दिया..मैंने दीप्ति से नीरज के आने का समय पूछा तो पता चला वो 6 बजे आयेगा,तो में भी धीरज के साथ ग्राउंड में आ गया...
लेकिन ये क्या कूलर वाले कमरे से बहार आते ही फिर से शरीर से पसीना शुरू...जल्दी ही वापस ऊपर आना पड़ा।
शाम के 6 बज गए थे,दीप्ति ने बताया वो अपनी मोटरसाइकिल मोडिफाइड करवा रहे है..मैंने कहा मोडिफाइड करवा के नकली हार्ले डेविडसन बनवायेगा क्या..?? अरे नही नही केवल सीट मोडिफाइड करवायंगे।।
में शास्त्री पार्क में नींद के झोंके खा रहा था,और नीरज कुमार उधर करोल बाग में बुलेट वालो के मजे लेते हुवे,अपनी सीट मोडिफिकेशन की पोस्ट फेसबुक पर शेयर कर रहा था...
मैने मेसेज किया बहुत गलत बात है..!
रिप्लाय मिला-अबे तुभी आजा..करोलबाग तो दिन में देखकर ही गया है..
लेकिन मैंने दिन में ही दिल्ली के ट्रैफिक के बुरे हाल देख लिए थे..फिर से वहीं फ़सने की नादानी भला कैसे करता..
इससे अच्छा तो यही सोया रहूँगा...
इंतजार करते करते फिर से नींद आ गई..
वापस होश सम्हाला तो रात के 9 बज़ गए थे।
लेकिन नीरज अब तक नही आया था,मैंने भी बार बार पूछकर परेशान करना ठीक नही समझा.. सोचा डिस्कवर का उत्परिवर्तन हार्ले डेविडसन के रूप में आज होकर ही रहेगा...
जब समय रात के 9.30 से भी ज़्यादा हो गया तो समझ गया था कि आज यात्रा शुरू नही होगी। अब कल सुबह ही निकलेंगे,यह मेरे लिए भी बहुत अच्छा था,आज ही 950 किलोमीटर गाड़ी चलाकर आया हु,रात को नींद पूरी कर लूंगा,तो आगे की यात्रा के लिए थोड़ी आसानी होगी।
अचानक दरवाजे में फिर से हलचल हुई..
और इस बार नीरज महाराज अंदर प्रवेश कर रहे थे।
मेरा मन,उठकर,गले मिलने,हाथ मिलाने,सेल्फी लेने का बिल्कुल भी नही हुवा..बस पलंग पर बैठा रहा..एकदूसरे को देखकर दोनों हँस दिए..हो गया अभिवादन..!
नीरज घर मे आते ही अपनी पसंदीदा ड्रेस पहनकर मेरे साथ ही पलंग पर बैठ गया..हम लोग आज नही जायँगे ऐसा ऐलान करने की जरूरत नही थी,यह सब को पता था।
खाने की थाली फिर से तैयार थी,लेकिन इसबार केवल नीरज के लिए,मे तो पहले ही टारगेट पूरा कर चुका था..थाली के साथ ही आम की फ़रमाइश भी हो गई..
पलंग पर ही हम तीनों की (में,नीरज,दीप्ति) की मीटिंग शुरू हो गई...सबसे पहले नीरज ने मुँह खोला और कहा..पिछले 8 दिनों से बस इसी यात्रा की तैयारी कर रहा हु,कहाँ जाये कहाँ न जाये के चक्कर मे पूरे मैप को खंगाल लिया..
इस बीच मैंने कह दिया..वो ब्रम्हीताल वाला ट्रैक में कर लूँगा क्या...? इसके पहले कही कोई ट्रैकिंग नही की है।
तो नीरज ने कहा..अगर तेरे को डर है तो ट्रैकिंग नही करते..बाइक से घूमते रहेंगे..तीन दिन गंगोत्री,हरसिल के लिये मुझे दे दो।
बाक़ी तुम अपने हिसाब से प्रोग्राम जमा लो..
ऐसा सुनते ही,में खुशी से गदगद हो गया..लेक़िन कहाँ घूमेंगे..इसके ख्याली पुलाव पकाते पकाते हम चंद्रताल,सचपास,और भी पता नही कहाँ कहाँ घूम आये..
फिर नीरज कहने लगा वो तुम्हारे घुमक्कड़ी ग्रुप में भी पूछ लो..
इस ग्रुप में नया नया हु...खैर नीरज इस ग्रुप के शुरुआती(संस्थापक) सदस्यों में से है...लेक़िन अब ग्रुप में नही है...लेकिन जब से,में देख रहा हु,GDS में से ना तो नीरज की बातें पूरी तरह ख़त्म होती है..ना नीरज के दिल से GDS की बातें..फिर भी दोनों एक दूसरे से दूर दूर रहते है...
खैर...नीरज ने अगर हफ़्ते भर मैप खंगाला है।तो सारी प्लानिंग भी कर ली होंगी..लेक़िन उसकी आदत है सरप्राइज देने की..वो पहले से कभी कुछ नही बतायेगा..लेकिन यह तो पक्का है,कि हर रोज लिंक से हटकर किसी वीरान रास्ते पर और आम पर्यटकों से दूर..सुनसान सी किसी जगह पर जरूर ले जाएगा..
मुझे पता है,करना उसे अपने मन की है,फिर भी हमें फ़ालतू काम मे लगाए रखना है...मैंने कह दिया तीन दिन गंगोत्री हरसिल के..बाकी कही भी घूमते रहेंगे..अभी से कोई योजना नही बनाएंगे।
हमें ट्रैकिंग तो करना नही है..टेंट यही रख देता हूं..तो नीरज कहने लगा..हाँ टेंट यहीं रहने दो..लेक़िन किसने बोला हम ट्रैकिंग 
नही करेंगे..ट्रैकिंग तो होगी।
फिर से संशय...मैंने फिर पूछा भी नही ट्रैक कौन सा करेंगें...सोचा राज़ को राज़ ही रहने दो !
और भी गपशप होती रही...तब तक रात के 11 बज़ गए...कल सुबह जल्दी निकलेंगे...ऐसा कहते हुवे सोने की तैयारी होने लगी,तीनों घुमक्कड़,कूलर वाले कमरे मे जाकर सो गए...सोते ही गहरी नींद लग गई।

06 जून 2018

अचानक से...ओये डॉक्टर...अबे उठ...की आवाज़ आई।तो लगा अभी 2 मिनीट पहले ही तो सोया था।
आँख खुलते ही,पहले नज़र घड़ी में गड़ाई..तो सुबह के 4 बज़े थे,थोड़ा और ध्यान से देखा तो नीरज चक-पक होकर मेरे सामने खड़ा था,उसे देखते ही मेरी नींद,थकान सब छू मंतर हो गई,वो आमतौर पर इतनी जल्दी नही उठता है,आज शायद 3 बज़े ही उठ गया था,तो मेरा भी साथ देना बनता था,आधे घंटे का समय लगा और में भी चक-पक हो गया।
चाय-बिस्किट लेने के बाद,सारा सामान नीचे ले आये,और दोनों बाइकों पर ठीक से बांध लिया,बस फिर क्या था,सुबह के 4.50 बज़े हमारी यात्रा शुरू हो गई।
मुझे पेट्रोल टैंक फुल करवाना था,तो शास्त्री पार्क से निकलते ही पहला काम यही किया..
अच्छा हाँ.. कल की उमस और गर्मी को देखते हुवे,नीरज ने बारिश की भविष्यवाणी कर दी थी,तो रेनकोट छोटे बेग में ही रख लिया।
दिल्ली से निकलते ही हम दोनों की मोटरसाइकिलें सुबह की ठंड़ी ठंड़ी हवा के साथ बातें करने लगी,निकलने के पहले मैंने रूट पूछा तो नही लेक़िन 5 किलोमीटर बाद ही समझ आ गया कि हम सोनीपत-पानीपत होते हुवे आगे जायँगे।
एक घंटे बाद हम 53 किलोमीटर दूर मुरथल के आसपास कही रुक गए,यहाँ से सोनीपत पास ही था,यहीं हमारें चर्चित व्हाट्सएप प्रशासक और घर वापसी विशेषज्ञ संजय कौशिक जी का भी निवास है,कल ही उनका संदेश भी आया था,गुड़गाँव में मिलने के लिए,यह बात नीरज को भी पता थी,तो तीनों की आपसी सहमति से कौशिक जी को फ़ोन कर दिया कि हम आ रहे है..नीरज पहले भी इधर उनसे मिल चुका था,फिर भी व्हाट्सएप पर लोकेशन शेयर कर ली,15 मिनीट बाद हम तीनों कौशिक जी के घर पर थे।हमारे पहुँचते ही कौशिक जी एक अच्छे प्रशासक की तरह तीनों से,गर्मजोशी से मिले,उनके बेटे युवराज़ और भाभी जी से नमस्ते हुई।फिर पहुँचते ही हमारे लिए चाय-बिस्किट-नमकीन और कौशिक जी के लिए तौरी की सब्जी-चपाती की प्लेट सामने आ गई..और इधर-उधर की बातें होने लगी,कौशिक जी की जॉब गुड़गाँव में है,सोनीपत से उनकी ट्रेन का समय भी होने ही वाला था,फिर भी हम सब बैठे बैठे बतिया रहे थें,सबकी नजर अचानक घड़ी पर तो सभी फ़टाफ़ट नीचे आ गए,घर के बाहर ही,नीरज की नई नवेली क़िताब मेरा पूर्वोत्तर का आदान-प्रदान और फिर ग्रुप फ़ोटोग्राफी का आयोजन हुवा..
टाटा-टाटा-बाय-बाय कर सब अपनी अपनी यात्रा पर चल दिये...
बाहर का मौसम अभी भी सुहावना था,ठंडी हवा चल रही थी..सुबह के 7 बज गए थे फिर भी धूप नही निकली थी,निश्चित ही आगे कहीं बारिश हो रही होगी।हम लोग नेशनल हाइवे 44 के 6 लेन दिल्ली-अम्बाला रोड़ पर पानीपत की और आगे बढ़ रहे थे,जैसे कि सुबह शास्त्री पार्क के मौसम विशेषज्ञ ने बारिश की भविष्यवाणी की थी,बारिश शुरू हो चुकी थी,लेकिन इतनी भी तेज़ नही,की आगे बढ़ ना सके।
बीच मे कही रेनकोट पहनने की आपाधापी के बाद में जब मैं फिर से आगे बढ़ने लगा तो मुझें पता ही नही चला कि मैंने नीरज को कब ओवर टेक कर दिया,मुझे लगा वो आगें कही मिलेगा,इस चक्कर में कब करनाल,कुरुक्षेत्र पार हो गया पता ही नही नही लगा।हमे आज विकासनगर (देहरादून) की तरफ़ जाना था,मुझें यह पता था कि पोंटासाहिब होते हुवे जायँगे,तो जहाँ भी इसका दिशा संकेतक आयेगा मुड़ना होगा,बाकि नीरज तो आगे ही है,जहाँ से मुड़ना होगा वो रुकेगा ही,लेक़िन वास्तव में सब इसका उलट ही रहा था,ना तो देहरादून-पोंटासाहिब का दिशानिर्देश कहीं मिला,ना आगे नीरज..
वो तो बेहतर था कि मैंने फोन चालू कर कान में हेंडफ्री लगा रखी थी,नीरज का फ़ोन आया..
उसने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में बड़ा सा हेल्लो... बोला और कहा भाई में तेरे पीछे चल रहा हु..आगें शाहबाद आयेगा,वहाँ रुक जाना...
मैंने कहाँ हऊ वही मिलता हु...
हम शाहबाद में मिल गए...और मेरी खिंचाई शुरू..
नीरज-"अरे हमें करनाल से ही यमुनानगर के लिए मुड़ना था,तुम ना तो करनाल में रुके ना ही कुरुक्षेत्र में,ये भी ध्यान नही है कि हम पीछे है,पता है तुम्हारी बुलेट 70 से शुरू होती है और हमारी डिस्कवर 70 पर ख़त्म...फ़ोन नही करता तो तुम तो अम्बाला ही पहुँच जाते..."
में-भी कब तक सुनता... "धीरे से कह दिया भाई सुबह के 10 बज़ने वाले है,मुझें तो ज़ोरो की भूख लगी है,तुम्हें भी लगी ही होगी,चलों आलू के पराठे खाते है।"
इतना सुनते ही नीरज का रूप बदल गया...हाँ, हाँ तो चलो ना,मैंने कब मना किया...
आलू का बना,जो कुछ भी हो..नीरज को प्रिय है,और समोसा,पराठा तो अतिप्रिय...
आलू-पराठे बनते तब तक हमारी आगे की योजना बन गई..
नीरज कहने लगा-जो हुवा अच्छा ही हुवा,इस बहाने नया ग्रामीण रास्ता देखने को मिलेगा.. हम यहाँ से नारायणगढ़,कालाअम्ब होते हुवे पोंटासाहिब जायँगे।
पराठे खाकर फिर से चल दिये,बढ़िया 2 लेन ग्रामीण सड़क मिली.. अब में पीछे ही चल रहा था,रास्ते मे थोड़ी बारिश शुरू हुई तो फिर से रेनकोट पहन लिया,हरियाणा का मौसम आज ग़जब ही ढा रहा था,लेक़िन जैसे जैसे आगे बढ़ रहे थे,इसका असर कम होते जा रहा था,फिर कहीं,बारिश बिल्कुल बंद हो गई,ऐसे में रेनकोट पहने रहना बर्दाश्त नही हो रहा था,काला अम्ब यानी हिमाचल में पहुँचते ही हालत पसीना पसीना हो गई, तो रुककर तीनों ने रेनकोट निकाल दिए,रुककर तीनों हिमाचल प्रदेश की गर्मी को कोसने लगें।
तभी नीरज कहने लगा-अच्छा बताव काला अम्ब में घूमने की जगहें क्या-क्या है..?
मैंने कहा-यहाँ काले आम का बाग़ होगा...लेकिन तुम कहाँ लेकर चल रहे हो ये बताव..
नीरज ने कहा-हम चलने वाले है..फॉसिल पार्क..शिवालिक फॉसिल पार्क..सुकेती।
कच्छ और थार में भी तुम्हें फॉसिल पार्क घुमाया था,यहाँ भी घुमाऊंगा...
मैंने कहाँ-हाऊ..चलो भीया।
काला अम्ब से हम सुकेती रोड़ पर आ गए,5 किलोमीटर बाद ही हम गुमनामी में खोए शिवालिक फॉसिल पार्क पहुँच गए..
यह एकांत सी जगह में बना है,बारिश के मौसम में यह जगह वास्तव में गुलज़ार रहती होगी।
गेट के बाहर ही गाड़ी खड़ी कर प्रवेश कर लिया,प्रवेश टिकिट लेने की जरूरत नही थी,फ्री प्रवेश था।
अंदर दो बड़े से हॉल में मेरूदंडधारी जीवों और वनस्पतियों के जीवाश्म और बहुत से मॉडलों को सुरक्षित और व्यस्थित ढंग से प्रदर्शित किया गया है।दोनों हॉल में आराम से घूम लेने के बाद आकर्षक लग रहे "मनुष्य के विकास क्रम" के एक वॉलपेपर के पास फ़ोटो लेने लग गए..
बाहर भी मेरुदंडधारी जीवों के मॉडल सजाकर कर रखे हुवे थे।
अब यहाँ से हमें विकासनगर की ओर जाना था,नीरज पहले ही मैप का अध्ययन कर चुका था, यहाँ से हमें,वापस काला अम्ब जाने की कोई जरूरत नही थी,सुकेती रोड़ से ही हम आगे चलते हुवे कोलार रोड़ पर आ गए।सड़क कच्ची जरूर थी,लेक़िन कुछ किलोमीटर बचाने के लिए सौदा बुरा नही था।मुख्य मार्ग पर पहुँचते ही छोटे से रेस्टोरेंट पर रुक गए,गर्मी से तीनों के बुरे हाल थे,कुछ नमकीन और माज़ा की बोतल लेकर यही बैठ गए,तो बहुत ही अच्छी अनुभूति हुई।
लेकिन यहाँ भी कब तक बैठे रहते,माज़ा का असर रहते ही निकल जाना बेहतर था।तो फिर चल पड़े और सीधे पोंटासाहिब गुरुद्वारे जाकर रुके,तीनों ने साहिब के दूरदर्शन किये और गलियों में से दो काले चश्मे खरीदते हुवे आगे बढ़ गए।
कुल्हाल(यमुना) ब्रीज पार करते ही हम उत्तराखंड में थे,इस ब्रीज के इसपार हिमाचल, उसपार उत्तराखंड है।अब यहाँ से विकासनगर केवल 20 किलोमीटर ही था।
विकासनगर में प्रवेश करते ही दोनों ओर आ रही आम और लीची की महक़ से हम सराबोर हो गए,सड़क के दोनों ओर पेड़ो पर आम और लीची के झुरमुट लगे थे,यह सब मेरे लिए पहला अनुभव था।
काला अम्ब में ही नीरज ने कह दिया था कि विकासनगर में लंच हमारा इंतजार कर रहा है,तब मुझे अंदाजा हो गया था,किसी मित्र के यहाँ रुकने वाले है,लेकिन यह मित्र कौन है,यह नही पता था,नीरज और दीप्ति मोबाइल नेविगेशन को देखते हुवे आगे चल रहे थे,थोड़ी देर बाद एक घर के बाहर हमारी गाड़िया रुक गई,घर के बाहर से ही उदय झा साहब हमें घर की राह दिखा रहे थे,नीरज और दीप्ति के गृहप्रवेश करते समय उनकी ख़ुशी देखते ही बनती थी,झा साहब,भाभी जी, उनकी दोनों बिटिया..सभी बहुत खुश थे।इस बीच झा साहब से मेरा भी प्रथम परिचय हुवा,इससे पहले उनसे कहीं कोई परिचय नही था,फेसबुक बुक पर भी नही।
झा साहब रहने वाले उदयपुर के है लेकिन अपने घुमक्कड़ मन और प्रकृति के क़रीब रहने की आदत के कारण पहाड़ों के अतिनिकट, शांत शहर विकासनगर में ही बस गए,उनके कुछ फ़ोटोग्राफ़ देखकर अंदाजा हो गया कि वे बेहतरीन फ़ोटोग्राफ़र भी है।
जाते ही ताज़ी लीची का गुच्छ हमारे सामने 
रख दिया गया।नीरज कहने लगा जाव तुम पहले नहाकर आव,फिर लीची को हाथ लगाना। में हाऊ भीया कह कर,यमुना-टोंस के मिश्रित शीतल जल से नहाने चला गया,अब तरोताज़ा होकर झा साहब के साथ लीची खाने बैठ गया,लीची को खाने में जितना आनंद मिल रहा था उतना ही या उससे भी अधिक आनंद लीची को छिलने में आ रहा था,छिलने को बिना ब्रेक किये,अखंड,वन वे छिलाई की जा रही थी।नीरज और दीप्ति भी अपना अपना नंबर आने पर नहाने खिसक लिए,फिर जब तीनों का सुगंधिम पुष्टिवर्धनम हो गया बहुप्रतीक्षित भोजन हमारे सामने आ गया,झा साहब कल शाम से हम सभी का इंतजार कर रहे थे,लेकिन नीरज की बाइक सीट मोडिफिकेशन के कारण सारा प्रोग्राम लेट हो गया था,लेकिन सीट मोडिफिकेशन बहुत जरूरी काम था,पिछली सीट पर बैठकर लंबी दूरी की यात्रा करना,बड़ा दुष्कर होता है,ऐसे सीट पर यह थोड़ा आरमदायक हो जाता है।
लज़ीज खाना ख़त्म करते ही नीरज कहने लगा,मेरी मोटरसाइकिल का पो-पो ख़राब हो गया है,मेकेनिक को बताना होगा,झा साहब कहने लगें चलो बाज़ार ठीक करवा लाते है।मैंने भी गाड़ी धुलवाने का बहाना बना लिया और तीनों साथ मे चल दिये,मेरी देखा-देखी नीरज ने भी गाड़ी की धुलाई करवा ली,नही तो वो अपनी गाड़ी को ऐसे लफड़ों से दूर ही रखता है।हम तीनों गैरेज के बाहर खड़े थे इसी बीच नीरज के एक और मुरीद शिव सरहदी जी भी वही आ गए,आपसी मेलमिलाप के बाद कल हम किस रास्ते से चकराता और उत्तरकाशी जाय,इस बारे में चर्चा होने लगी,गाड़ी धुलाई वाले के पास एयर कंप्रेशर की व्यवस्था नही थी। इसकारण मेरी बुलेट,धुलाई के बाद चालू होने में नख़रे करने लगी,एयर प्रेशर से प्लग साफ कर देते तो तुरंत चालू जो जाती।लेक़िन जब हम सभी ने एक एक किक लगाई तो थोड़ी ही देर में चालू हो गई,लेक़िन यही से नीरज एन्ड कंपनी को बुलेट की बुराई गिनाने का मौका मिल गया,फिर रोज़ उसकी गिनती में हिजाफा ही होते रहा।
खैर किसी तरह गाड़ी झा साहब के घर पहुँच ही गई,यहाँ पहुँच कर चेन में तेल का स्प्रे भी कर दिया,अब गाड़ी रातभर खड़ी रहेगी तो अपने आप सारा पानी सूख जाएगा,सुबह कोई दिक्कत नही।
अब शाम होने लगी थी,अंधेरा भी धीरे धीरे गहरा रहा था।में,नीरज-दीप्ति और झा साहब का पूरा परिवार अपनी अपनी आराम कुर्सी लेकर ओपन-टेरेस-नुमा-आँगन में एक यादगार शाम का आगाज़ करने बैठ गए,धीरे-धीरे झा साहब की पूरी मित्र मंडली अपने परिवार सहित महफ़िल का हिस्सा बनने आती गई।पूरी मण्डली में सबसे रंगीन मिजाज़ शख़्स शिव सरहदी जी थे,उनका साथ पूरी महिला मण्डली दे रही थी,सबसे ज़्यादा चुप में और नीरज ही थे,खैर महफ़िल में गपशप का केंद्र बिंदु नीरज-दीप्ति की घुमक्कड़ी ही थी,तो नीरज तो फिर भी बोल रहा था,लेक़िन मेरे बोलने के लिए तो ज्यादा कुछ नही था,लेक़िन सुनने के लिए बहुत कुछ था।
हमारी महापंचायत 8 बज़े के पहले शुरू हुई थी,रात के 12 कब बज़ गए पता ही नही चला।धीरे धीरे सभी मित्र विदा होने शुरू हो गए,शिव सरहदी जी ने हम तीनों को सुबह आलू पराठा के नाश्ते के लिए आमंत्रित किया तो नीरज ने पूरी गर्दन गोल घुमा दी।तो शिव सरहदी जी ने मस्त अंदाज़ में कहा-यू..कर के यू..सीधे फुर्ररर ना हो जाना..सुबह आना जरूर।उनका प्रेम-भाव ही था,कि हमें सुबह उनके यहाँ जाना ही पड़ा।
रात की महफ़िल जब ख़त्म हो गई तो सब सोने की तैयारी में थे,लेकिन अभी रात का खाना भी बाक़ी था,झा साहब ने अपने आतिथ्य मे कोई कसर नही छोड़ी थी,हम भी उनके कहने पर खाने में जो सामने आ रहा था उसे उदरस्थ करते जा रहे थे।
खानपान से फ़रिख होते ही सीधे बिस्तर ही दिख रहा था,पड़ते ही नींद लग गई...


सुबह सुबह संजय कौशिक जी के साथ,में और नीरज-दीप्ति

नीरज,संजय जी और नीरज की लिखी क़िताब

शाहबाद से नारायणगढ़ के लिए बढ़िया ग्रामीण सड़क

बस यूं ही...


शिवालिक फॉसिल पार्क सुकेती





फॉसिल पार्क में प्रदर्शित मॉडल

न्यू जेनरेशन



इसी ब्रीज के एक और उत्तराखंड और एक और हिमाचल..

विकासनगर के आसपास..




झा साहब के घर की बगिया में..






बाई ओर से झा साहब,नीरज और शिव कुमार जी





31 comments:

  1. Very nice sir, आगे की स्टोरी भी शेयर करिये

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    1. धन्यवाद गौरव जी...
      पूरी यात्रा ही लिखूंगा...

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  2. बहुत बढ़िया डॉक्टर साहब...

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    1. धन्यवाद अनिल जी...

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  3. बहुत ही बढ़िया डॉक्टर साहब
    आगे की यात्रा का इनतजार है...

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    1. धन्यवाद रिंकू जी...आगे का प्रकाशन भी जल्द...

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  4. हाय रै तोरी !!!

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  5. सुमित शर्मा जी मजा आ गया।

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    1. धन्यवाद पाण्डेय जी...

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  7. चित्र ओर विवरण बहुत ही शानदार

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    1. धन्यवाद पाटिल जी..

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  8. बहुत बढ़िया विवरण...

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    1. धन्यवाद अमित जी...

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  9. खाने से शुरू खाने पर खत्म ।
    बढ़िया यात्रा वृतांत । आगे की रोचक कड़ियों की प्रतीक्षा रहेगी । वैसे आप भी अतिथि सत्कार में कोई कमी नही रखते । आपके घर के दाल-बाफले आज भी याद है ।

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  10. धन्यवाद पाण्डेय जी...
    अतिथि देवो भवः,हमारी धरोहर है।
    बाक़ी जब कोई घुमक्कड़ मित्र घर तक आ जाते हो तो ख़ुशी कई गुना बढ़ जाती है।

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  11. आनंदम ही आनंदम! मज़ा आ रहा है घुमक्कड़ी में साथ साथ ही हूँ, यही महसूस हो रहा है। विकासनगर वाले मित्रों से तो मिलने की इच्छा जागृत हो गयी है।

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    1. धन्यवाद सिंघल जी...
      विकासनगर के मित्रों ने वहाँ बढ़िया माहौल बना रखा है।

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  12. हयूं भिया पक्का इंदौरी और सेव के बारे में तो एक इंदौरी घुमक्कड़ ने जिक्र ही नही किया...सेव नही ले गए थे क्या.....चलो और भी लोग है जो डॉक्टर साहब को उनके प्यार की बुराई भी करते मिले (बुलेट की ) ....बढ़िया मजा आ रहा है

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  13. नही भाई सेंव नही ले गया था...
    बाक़ी तो कोई कितना भी बुरा कह ले..शाही सवारी तो शाही ही रहती है...बुराई का क्या है...पंचायत लगा के हम तीनों करते भी तो क्या करते...

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  14. बढ़िया यात्रा

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    1. धन्यवाद त्यागी जी

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  15. आपकी लेखनी से ये यात्रा जबरदस्त चल रही है ..... बहुत खूब ...

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी..

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