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Tuesday, 3 July 2018

उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-3 सफ़र लखवाड़,चकराता घाटी होते हुवे लोखंडी तक


विकासनगर मे 06 जून का रात्रिभोज..
विकासनगर मे कल रात की महफ़िल और लेट नाइट डिनर के बाद झा साहब के घर पर सोये तो 10 मिनीट बाद ही होश नही था।मौसम उमस वाला था,लेक़िन कूलर ने अपना काम अच्छे से किया।नींद सीधे सुबह 8 बजे ही खुली।उठते ही हम तीनों (में,नीरज-दीप्ति) बारी बारी से नहा लिए।
वैसे एक बात बताता हूं,05 जून को इंदौर से दिल्ली पहुँचते ही मैंने अपना रवैय्या बदल लिया था। किसी भी यात्रा में सुबह जल्दी उठना मुझे अच्छा लगता है,एक दिन में ही कई जगहें घुमने की योजना रहती है,अधिक से अधिक दूरी तय करना भी योजना का हिस्सा रहता है।लेक़िन इस बार सोच लिया था,दिल्ली के बाद ,ना तो सुबह जल्दी उठूँगा ना ही कहीं भी पहुँचने की जल्दबाजी करूँगा।
मुझे तो केवल सुबह जल्दी उठने की आदत को ही बदलना था,बाक़ी तो नीरज की सारी प्लानिंग ही इसी ढंग की रहती है।तो आज हम तीनों आराम से उठे,आराम से तैयार हुवे।
नीरज ने थोड़ा गुगल मैप में कुछ इधर उधर किया और हमारी आज की योजना तैयार हो गई।
झा साहब के यहाँ से रवानगी...
आज हम चकराता-देववन-लोखंडी की ओर जाने वाले है,विकासनगर से चकराता जाने का परम्परागत मार्ग डाकपत्थर रोड़ से  कालसी,अमराहा,सहिया,कोटी होते हुवे है।इस मार्ग से विकासनगर से चकराता की दूरी मात्र 55 किलोमीटर के लगभग है।
लेक़िन झा साहब के द्वारा दिये गए एक बेहतरीन वाटर फॉल के लालच और हमारी गैरपरंपरागत मार्ग पर चलने की जिज्ञासा के कारण हम लोगों ने कटापत्थर-लखवाड़-नाग्त्हत-चिरमिरी टॉप होते हुवे चकराता पहुँचने वाले मार्ग को चुुुुना।
इस मार्ग से यह दूरी बढ़कर 85 किलोमीटर हो जायेगी, हमें कौन सी जल्दी है,घूमते घामते इसी मार्ग से जाना निश्चित हो गया।
सुबह की चाय-बिस्किट झा साहब के साथ लेने के बाद हम सभी नीचे आ गए,झा साहब ने सपरिवार,नीचे आकर हमें विदा किया
शिव सरहदी जी भी यहाँ आ चुके थे।
पिछ्ली रात को शिव सरहदी जी के घर पर ही ब्रेकफास्ट का वादा हुवा था,दीप्ति ने झा साहब की रसोई में सुबह ही ताज़े आम की चटनी तैयार कर ली थी।उधर शिव कुमार जी के यहाँ आलू के पराठे बन रहे होंगे।
झा साहब से टाटा-टाटा-बाय-बाय कर,अब शिव सरहदी जी के घर चल दिए, विकासनगर कोई बहुत बड़ा तो है नही,दो तीन गलियों से इधर उधर हुवे और शिव सरहदी जी का घर आ गया।
भाभी जी ने सारी तैयारियां पहले से कर रखी थी।मैंने पिछली पोस्ट में बताया था कि शिव सरहदी जी रंगीन मिजाज़ है,वे जहाँ बैठ जाय वहाँ,हास्य तो हर समय बना ही रहता है,और साथ पूरा परिवार देता है।
स्वादिष्ट आलू पराठे विथ आम चटनी एंड दही..
हमारे पहुँचते ही गपशप शुरू हो गई।तो फ़िर दही-पराठे-चटनी-क्रीम-चाय सब गपशप के साथ ही चलते रहे।
थोड़ी देर बाद समय देखा तो दिन के 11 बज़ चुके थे।गपशप तो कभी खत्म नही होनी थी,लेक़िन हमें आगे भी जाना था।
अलविदा कह कर फिर से गलियों से निकलना शुरू कर दिया,शहर के बाहर तक शिव सरहदी जी भी साथ ही आ गए।
पेट्रोल टैंक फुल करवाने के बाद...11.30 बज़े हम विकासनगर से बाहर आ गए।

वैसे अग़र,विकासनगर की भौगोलिक स्थिति देखें तो,यह देहरादून ज़िले में हिमाचल प्रदेश के साथ लगती सीमा पर,यमुना नदी के तट पर बसा, छोटा सा नगर या कस्बा है।
शिवालिक पर्वत श्रंखला के बीच,यह असामान्य रूप से चौड़ी और लंबी घाटी वाला यह क्षेत्र दून घाटी (वैली) भी कहलाता है।
जैसा कि अभी बताया, कि यह दून घाटी में है,तो समुद्र तल से ऊँचाई भी बहुत ज्यादा नही है,विकासनगर की समुद्र तल से ऊँचाई 550 मीटर है।यहाँ से उत्तर की ओर जाने पर धीरे धीरे ऊँचाई बढ़ती जाती है।
विकासनगर से बाहर आते ही,अम्बाडी के पास से कालसी-चकराता मार्ग और बड़कोट मार्ग का विभाजन हो जाता है।
हमें बड़कोट रोड़ (कटापत्थर) की और जाना था,तो दायें मोड़ पर मुड़ गए,आगे ही चोहरपुर रेंज के जंगलों की सुनसान सड़को से होते हुवे ऊँचाई प्राप्त कर रहे थे।
इससे आगें ही व्यासी पॉवर परियोजना का काम बड़ी जोर शोर से चल रहा है।बैराज के आसपास ही हम लोग झा साहब द्वारा बताया गया वॉटर फॉल ढूंढ रहे थे।इधर उधर पूछताछ की तो किसी ने ऊपर की ओर जाने को कह दिया,गए तो कुछ ना मिला, ऊपर कहीं से पानी बह रहा था,लेक़िन इसे वॉटर फॉल नही कह सकते थे।
और किसी से पूछते भी तो क्या पूछते ?
हमे जिस वॉटर फॉल जाना था,उसका कोई नाम तो था नही।ग़ुमनाम था।
खैर मौसम अभी बहुत गर्म था,यहाँ से जितना आगे जायँगे,उतना मौसम सुहावना मिलेगा,गर्मी भी कम होती जाएगी।
समय ना गंवाते हुवे आगे चल दिये।
आगे बढ़ते हुवे पुल से यमुना नदी को पार कर लिया और बड़कोट रोड़ पर ही चलते रहे।
थोड़ा आगे से ही लखवाड़ बेंड के लिए बाएं मुड गए।
जैसे जैसे आगे जा रहे थे ऊँचाई बढ़ रही थी।
लखवाड़ की समुद्र तल से ऊँचाई 1220 मीटर के लगभग है।
इधर की सड़क की बात करे तो,एक दम बढ़िया पक्की सिंगल लेन सड़क है, ट्रैफिक बिल्कुल भी नही। बहुत खूबसूरत राहें है।
वैसे लखवाड़ में ही महासु देवता का मंदिर भी है।
लखवाड़ में प्रवेश करते ही हम महासु उपत्यका क्षेत्र मे आ गए थे। चार तहसीलें-कालसी,चकराता,त्यूनी,मोरी इस उपत्यका मे शामिल है।
महासु देवता इस क्षेत्र के देवता है।इनका प्राकट्य मेंद्रथ में हुवा,ऐसा माना जाता है।यह भी माना जाता है,कि जब असुरों का आतंक बढ़ा और वे नरभक्षी हो गए,तब इस विपदा निवारण के लिए महासु देवताओं का अवतरण हुवा,और देवता-असुरों के संघर्ष के बाद आसुरी ताकतों अंत हो गया।
महासु उपत्यका जौनसार-बावर भु भाग में है।
इस क्षेत्र के परिसीमन को देखें तो यह क्षेत्र उत्तर में उत्तरकाशी,दक्षिण में देहरादून,पुर्व में यमुना नदी,पश्चिम में टोंस नदी से घिरा हुआ है।
इसमे नीचे का निम्न पर्वतीय क्षेत्र जौनसार और उच्च पर्वतीय बावर क्षेत्र है।
जौनसार-बावर क्षेत्र ही जौनसारी जनजाति का मूलस्थान है,इस जनजाति का सम्बन्ध महाभारत काल से बताया जाता है।
जौनसारी लोग अपने को पांडवो का वंशज मानते है,वहीं बावर अपने को कौरवों का।
मेरा कभी इस क्षेत्र में रुककर जौनसारी गाँवो के जनजातिय भाई बंधुओं के साथ समय बिताने का बहुत मन है,खैर देखों यह कभी कब आता है।
लखवाड़ से आगे लक्ष्यर में भी महासू देवता का भी मंदिर है।
आगे बढ़ते रहे और सिनोता,गडोल,सिला,
नाग्त्हत(1869 मीटर) पर आ गए।
अब धीरे धीरे गर्मी का असर भी कम हो रहा था। लेक़िन सुबह 10 बज़े के आलु पराठों के नाश्ते के बाद कही भी लम्बा ब्रेक नही लिया था।
नीरज आगे आगे ही चल रहा था,में पीछे आराम से रूकते रुकते आ रहा था,आखिर हिमालय में पहली बार मोटरसाइकिल लेकर आया था,जहाँ कहीं अच्छा दृश्य दिखाई देता रुक जाता।
आगे कही ड्यूडीलानी नाम की जगह पर एक छोटी सी दुकान पर नीरज बैठा हुआ था।में भी वही रुक गया।दोपहर के 2 बज रहे थे।मौसम तो सुहावना था,लेक़िन गर्मी में से आ रहे थे,तो कोल्ड्रिंक (माज़ा) की बोतल और साथ मे कुछ नमकीन के पैकेट ले लिए,कोल्डड्रिंक की बोतल फ़्रीज मे नही रखी थी,साधारण तापमान वाली ही थी,दुकान वाले बाबा से पूछा तो कहने लगे मौसम बहुत गर्म होता ही नही है,इसीलिए जरूरत ही नही है, फ़्रीज की।
में इंदौर से ही कुछ सुखा नाश्ता बैग में रख लाया था,उसे अभी तक कहीं निकालने का मौका ही नही मिला था,यहाँ पर उसे भी निकाल लिया,पहले दीप्ति को एक पैकेट में से कुछ दिया और कहा,ये लेव काजू खाव...
हम्म्म्म इन्हें आप काजु कहते हो...
मैंने कहा हाँ...
नीरज को भी दे दिया वही..और कह दिए ये ले काजु खा...
नीरज कहने लगा..धत्त...काजु कह के मूंगफली के दाने खिलाते हो...
खैर नमक चढ़े,यह दाने या सिंग दाने मुझे बहुत अच्छे लगते है..जब में अपने आत्मपटल पर इन्हें काजु मानकर खाता हूं,तो स्वाद काजु का ही आता है।
वहाँ बैठे बैठे मसखरी भी कब तक करते,हमें आगे भी तो जाना था।तो यहाँ से चल दिये चकराता के लिए।
अभी मैदानी इलाकों में गर्मी चरम पर होगी और हम यहाँ बाह्य हिमालय की शिवालिक पर्वत श्रृंखला की हसीन वादियों में एक तरफ पहाड़ तो दूसरी तरफ गहरी घाटी की सुंदरता निहारते हुवे,सभ्यता से दुर,सुंदर रास्तों से होते हुवे चकराता की तरफ जा रहे थे।
बहुत ही आराम से सुंदर दृश्यों को अपने कैमरे में कैद करते हुवे आगे बढ़ रहे थे।हमें कोई जल्दी नही थी।
अगर जल्दी चकराता पहुँच गए तो टाइगर फॉल चले जायँगे,देर हो गई तो देववन की तरफ जायँगे।ना तो टाईगर फॉल कही भागे जा रहा है नाही देववन की तरफ पहाड़ धसने वाले है,तो जल्दी किस बात की।हम बहुत आराम से चल रहे थे,और में तो बहुत ही आराम से चल रहा था,आज एक भी बार नीरज से आगे नही निकला,कई बार मेरे कारण उसे रुकना भी पड़ा रहा होगा,लेक़िन में भी क्या करता,हिमालय में पहली बार मोटरसाइकिल लेकर जाओ तो ऐसा होना स्वाभाविक ही था।
छायाकार-दीप्ति जाट

 सोनी कैमरे का आटोमोड जिंदाबाद
ड्यूडीलानी से निकलने के बाद चकराता घाटी की,सुंदरता की महक़ हर एक बढ़ते कदम के साथ बढ़ती जा रही थी,हम लोग भी 1-2 किलोमीटर चलते और फिर रुक जाते और फोटोग्राफी मे लग जाते,ऐसी ही एक बढ़िया लोकेशन पर रुककर ग्रुप फ़ोटो भी लेना चाहा, अब उधर कोई हमारें सिवा था तो है नही,ऐसे में कैमरे के ऑटो टाईमर ने अपना काम बख़ूबी किया।ऐसे ग्रुप फ़ोटोग्राफ़ हमेशा के लिए यादगार बन जाते है,मौका मिलते ही इनका हिस्सा बन जाना चाहिए,हम तीनों ने भी यही किया।
जब तक हम चकराता छावनी में प्रवेश करते,तब समय शाम के 4.30 के करीब हो चुका था। यहाँ से टाइगर फॉल की दूरी अभी भी 20 किलोमीटर के लगभग थी। नीरज आगे चल रहा था,और वो टाइगर फॉल के लिए नही मुड़ा, में समझ गया कि समय ज्यादा हो गया है,आज टाइगर फॉल नही जायँगे।
अब हम देववन-बुधेर केव की और जाती रोड़ पर चल दिये,दोनों जगह चकराता से अधिक ऊँचाई पर है।चकराता के बाद 5-7 किलोमीटर के लगभग रोड़ थोड़ी सी टूटी फूटी थी,लेक़िन हम दोनों की मोटरसाइकिलें आराम से चल रही थी,चकराता पार कर के एक जगह पर तीनों सुस्ताने लगें, तब नीरज ने सारी स्थिति समझा दी, बताया कि सामने दिख रहे जाड़ी गाँव को क्रॉस करने के बाद सीधे ऊपर चड़ेंगे,और दुर  दिख रहा होटल के बाद कोई गाँव (लोखंडी) मिलेगा,वहीं कहीं आज अपना डेरा है,और अगर उससे आगें त्यूनि-हनोल वाला रोड़ अच्छा हुआ तो वही से आगे निकल जायँगे,इधर वापस नही आएंगे, ऐसी स्थिति में टाइगर फॉल देखना छूट जावेगा।
टाइगर फॉल नही देख पायंगे ऐसा सुनते ही दीप्ति का मुँह खुला का खुला रह गया...
मुझे कोई फ़र्क नही पड़ा,आदत है कि हर यात्रा में बिना कोई उम्मीद के जाता हूं,एकदम निर्मोही बन कर।और यह भी नही पता था कि टाइगर फॉल क्या बला है ? लेकिन दीप्ति को  उसकी खूबसूरती पता थी,इसलिए अफ़सोस होना लाज़मी था।
खैर इस मंत्रणा के बाद आगें बढ़ने लगें, रास्ता समझ ही लिया था,एक जगह कटे हुवे पहाड़ का प्राकृतिक प्रवेश द्वार नुमा दिखा तो फ़ोटो लेने के बहाने में थोड़ा पीछे रह गया।
पिछले 10-15 किलोमीटर से मेरी बुलेट थोड़े नख़रे कर रही थी,हैंडल को अधिक मोड़ने पर वह बन्द हो जाती,और थोड़ा सीधा करने पर फिर चालू हो जाती।बीच वीरान जंगल में करता भी तो क्या करता,जैसे तैसे चलाता रहा।
लेक़िन जाड़ी गाँव के आसपास पहुँचते-पहुँचते वो बिल्कुल बन्द पड़ गई।उस जगह में बिल्कुल अकेला था,सबसे पहला काम यह किया कि पेट्रोल नोब को रिजर्व लगाया,फिर भी स्टार्ट नही हुई।फिर हॉर्न को बजाना चाहा तो पो-पो की आवाज़ नही आई,इंडिकेटर चैक किये वो  भी बंद थे।सोचा नीरज को सूचना दे देता हु,कही वो बहुत आगे ना निकल जाएं।देखा तो मोबाइल में नेटवर्क ही नही था।
सामने ही एक मकान में कुछ लोग काम कर रहे,उनमें से दो आदमी मेरे पास आ गए,और कहने लगे-भाई जी प्लग को खोलकर साफ कर लेते है,हो जायेगी स्टार्ट।
मैंने कहाँ प्लग में कोई दिक्कत नही है,गाड़ी को करंट नही मिल रहा है,क्यों नही मिल रहा है वो देखना पड़ेगा।लेक़िन पहले तो ये बताव आपके फ़ोन में नेटवर्क है क्या ?
उन्होंने ने कहा हाँ,है।तो उनसे फ़ोन लेकर झट से नीरज को फ़ोन लगाया-रे भाई,ये बुलेट बन्द हो गई है,तुम रूम लेकर दीप्ति को छोड़कर आ जाव...मे जाड़ी गाँव की मेन रोड़ पर ही इसको चालू करने की कोशिश कर रहा हु।
नीरज ने कहा-रूम बाद मे लेते रहेंगे..हम अभी आते है...
नीरज को सूचना देकर निश्चिंत हो गया,गाँव वाला भाई और में मोटरसाइकिल मे करंट रुकने का कारण खोजने लगे,सबसे पहले फ़्यूज बॉक्स खोलकर फ़्यूज देखें, दोनों फ़्यूज सही सलामत थे।ऐसे में मुझें फ़्यूज बॉक्स में लगी कॉइल की चिंता सताने लगी,अगर यह ख़राब हुई होगी तो फ़स जायँगे...इस पार्ट्स का आसपास मिलना मुश्किल था, गाँव वाले से मैकेनिक का पूछा तो पता चला 16 किलोमीटर दूर चकराता में ही कोई मैकेनिक मिल सकता है।
मुझे और चिंता होने लगी,इस बीच गाँव वाले भाई ने हैड लाइट के पीछे,मीटर के नीचे किसी केबल को इधर उधर हिलाया तो इंडिकेटर ब्लिंक करने लगें, मैंने कहा बस इसको ऐसे ही पकड़े रहो..और सेल्फ़ दबा दिया,गाड़ी फिर से भट-भट करने लग गई,उधर से नीरज भी आ गया.. लेक़िन इधर जैसे ही गाँव वाले भाई ने तार को छोड़ा कि और गाड़ी फिर से बंद..
नीरज को सारी स्थिति बता दी,और अब डॉक्टर और इंजीनियर दोनों मिलकर फाल्ट ढूंढने में लग गए,साथ मे गाँव वाले भाई भी थे।दीप्ति इस केस की डॉक्यूमेंट्री बना रही थी।
मतलब सब अपने अपने काम मे लगे हुवे थे।

यह तो निश्चित था कि गाड़ी में कही कोई बड़ा फॉल्ट नही है,केवल वायरिंग संबंधित परेशानी है,और वो भी हेड लाइट के पीछे या माईलो मीटर के नीचे ही है..तीनों की नज़र वहीं थी, नीरज ने इग्निशन स्विच से निकले केबल के सॉकेट से कनेक्टर निकाला तो उसमें से थोड़ा पानी निकला, साफ़ कर के फिर जोड़ दिया लेक़िन कोई फ़र्क नही हुआ,करंट का सप्लाई अब भी रुका हुवा था।नीरज ने कहा वायर कटिंग कर के इस स्विच का कलेक्शन ही हटा देते है,लेक़िन एक डर यह भी था कि वायरिंग काटने के बाद भी गाड़ी चालू नही हुई तो फिर क्या करेंगे।
इस बीच गाँव वाले भाई ने मीटर के निचे और हेड लाइट के पीछे वाले हिस्से में झांका तो पता चला कि इग्निशन स्विच का एक तार खुला पड़ा है,कन्फ़र्म करने के लिए,इग्निशन स्विच को खोलकर बाहर निकाल लिया,और अब हमें इसका फॉल्ट मिल गया था,और नीरज अब निश्चिंत होकर स्विच का कनेक्शन हटाकर डायरेक्ट कनेक्शन कर सकता था,इंजीनियर साहब तार काटने की तैयारी में ही थे कि मैंने अपनी डॉक्टरों वाली बाय पास थ्योरी लगाई और गाँव वाले भाई से वाले से एक तार के टुकड़े की मांग की..दो मिनीट बाद एक नीले तार का टुकड़ा हमारे हाथ मे आ गया,बाक़ी काम इंजीनियर साहब का था,उन्होंने सॉकेट के छेद में तार का एक सिरा डाला,दूसरा सिरा दूसरे छेद में,झट से हॉर्न बजाया तो पो-पो की आवाज आ गई,कितने बेचैन थे,इस पो-पो की आवाज़ को सुनने को..
किक मारते ही फूँक निकालने वाले साइलेंसर से भट-भट की आवाज़ आने लगीं,उससे भी तेज़ हमारी ख़ुशी के मारे निकली चीखें थी।
केस निपटते ही इग्निशन स्विच को बैग में रख लिया...सॉकेट में लगे तार ही अब बुलेट की चाबी थे।
अच्छा हाँ...कल जब गाड़ी को धुलवाने के बाद गाड़ी स्टार्ट होने में नख़रे कर रही थी,तब से ही नीरज को मेरी बुलेट की बुराई करने का मौका मिल गया था,अब आज फिर इग्निशन स्विच कांड हो गया,यह होते ही उसे नया मसाला मिल गया था। जब उसे मौका मिलता शुरू हो जाता..
में भी उसका साथ दे रहा था,बुलेट प्रेम अपनी जगह..साथी के साथ मस्ती अपनी जगह...
खैर यह ब्रेकडाउन कभी भी,कही भी,किसी भी गाड़ी में हो सकता है।इसमें किसी की कोई ग़लती नहीं थी,ऐसे लक्षण इंदौर या दिल्ली में ही दिखते तो में वहाँ ठीक करवा लेता..चकराता के आसपास,में कर भी क्या सकता था।
खैर कोई बात नहीं... हमारी गाड़ी अब ठीक ठाक थी,गाँव वाले भाई से एक एक्स्ट्रा तार का टुकड़ा लेकर बैग मे डाल दिया,अभी लगाया टुकड़ा कही घूम गया तो एक्स्ट्रा वाला लगा लेंगे।
गाँव वाले भाई को धन्यवाद कहते हुवे हम आगे चल पड़े...चकराता के बाद ही हम चढ़ाई चढ़ते जा रहे थे।नीरज आगे आगे चल रहा था,लेकिन इस बार दूरी ज्यादा नही थी,साथ साथ ही चल रहे थे,शाम का समय था,दिन ढल रहा था,रास्ते की खूबसूरती का बखान करू भी तो क्या करूँ..बस बहुत खूबसूरत परिदृश्य था,मौसम बिल्कुल ठण्डा था।
नीरज ने पहले ही गगूल मैप को खंगाल रखा था,रास्ते मे होटल हिल टॉप आया,वहाँ हम नही रुके..और आगे लोखंडी गाँव आया,वही चौराहे पर ही गाड़ी को होटल स्नो व्यू के बाहर रोक दिया..बाहर ही होटल के मालिक रोहन राणा और उनके भाई खड़े थे।रूम के लिए पूछा तो उन्होंने कहा आइये देख लीजिये...
में और दीप्ति रूम देख आये,नीरज को बता दिया रूम बढ़िया है..पैसों की बात हुई..उन्होंने ने 1000 रूपए बताये..मैंने कहाँ 900..तो नीरज कहने लगा,अरे भाई जी 900 रु में हाँ करो..खाने में 100 रु ज़्यादा जोड़ लेना...
होटल मालिक समझ गया था,ये लोग केवल मस्ती कर रहे है,मुँह मांगा पैसा मिल जाएगा, उन्होंने कहाँ ठीक है ये लो चाबी..पहले समान रख दीजिए फिर आकर आई.डी.दे दीजियेगा।
गाड़ी में से बैग खोलकर रूम में पटक दिए...
कमरे में आते ही गपशप चालू हो गई..
थोड़ी देर पड़े रहे...फ़िर ढीलेढाले कपड़े और जैकेट पहन कर नीचे आ गए,होटल के नीचे ही उन्हीं का छोटा सा लेक़िन व्यवस्थित रेस्टोरेंट था।खाना बनने में तो अभी देर थी,तो चाय के साथ नमकीन ले लिया..इससे थोड़ी शांति मिली।
खाने का पूछा तो पता चला पनीर तो नही बनेगा,मिक्स वेज बन जाएगी, वही बनाने का कह दिया,अब बाहर मौसम और ठंडा होने लगने लगा था।तो थोड़ी चहलकदमी का वापस कमरे में आ गए।
सुबह 450 मीटर की ऊँचाई पर थे,और दिनभर की मोटरसाइकिल यात्रा के बाद अब लगभग 2300 मीटर की ऊँचाई पर आकर ठहरे थे।इसका किसी को भी कोई ख़ास असर तो नही था,लेक़िन फिर भी बिस्तर पर आराम करना अच्छा लग रहा था।
थोड़ी देर बाद रोहन भाई ने खाने के लिए आवाज़ लगाई तो तीनों वापस नीचे आ गए..
अभी अंदर जयपुर का एक परिवार भोजन कर रहा था,उनके बाद हमारा नंबर आएगा,तब तक रेस्टोरेंट के छोटे से किचन में ही सामान इधर उधर करने लगें, नीरज बेलन-चिमटा लेकर रोटी सेंकने लग गया..पहाड़ी लोगों का यही अपना पन भी तो में देखने आया हु..नहीं तो हमारे मैदानी लोगों तो गहन अनुशासन में बांधकर रख़ते है,किचन काउंटर एरिया में प्रवेश निषेध का पर्चा पहले से चस्पा कर देते है..और यहाँ हम उन्मुक्त होकर घूम रहे थे।
जयपुरी घुमन्तु जीवों का खाना निपटते ही,हम जाकर बैठ गए,बैठते ही चपाती-दाल-मिक्स वेज,एकदम गरमा गरम हमारे सामने आ गया..
खाने के बाद ठंड़ी और ज्यादा लगने लगी तो सीधे जाकर कंबल में घुस गए।
यहाँ मोबाइल नेटवर्क तो था नहीं.. या थोड़ा बहुत था भी..तो कमज़ोर था। तो मोबाइल मे बहुत ज़्यादा व्यस्त ना होते हुवे,हम तीनों की पंचायत शुरू हो गई..और फिर पंचायत लगती है तो,ज़माने भर की बातें होती है..ऐसी बातों का क्या है...करते ही भूल जाते है..
जब तीनों का बोल-बोल कर मुँह और हँस-हँस कर पेट दर्द करने लगा तो सो गए...

अब कुछ फ़ोटो देखिए

शिव कुमार जी के घर पर...छायाकार-नीरज कुमार


विकासनगर से कटापत्थर की ओर...


रतार गाँव..के पहले..

भोड़ा गाँव के आसपास से..

यमुना पुल के पास...एक नन्हा वॉटर फॉल








लखवाड़-चकराता के लिए हम बाएं मुड़ गए..

विकासनगर-बड़कोट रोड़-बडोवाला 

लखवाड़ के बाद एक जगह...


चाय- कोल्ड्रिंक स्टॉप



चकराता मे...




 टोंस और यमुना नदियों के बीच इस भु भाग की माटी बहुत उपजाऊ है..ऐसा ही एक खेत


 तू खींच मेरी फ़ोटो...

में खींचू तेरी फ़ोटो...

नाइस शॉट नीरज..




यूँही कहीं सुस्ताते हुवे..


हमराही मेरी हमराही...सिनोटा में..





फ़ोटो ऑफ द ट्रीप फॉर मी

चकराता से लोखंडी के लिए...


नाइस शॉट दीप्ति..


चकराता मे...

प्राकृतिक प्रवेश द्वार

गाड़ी की नई चाबी... तार के टुकड़े

इंजीनियर साहब डॉक्टर की गाड़ी का इलाज़ तल्लीनता से करते हुवे।

कमज़ोर नेटवर्क का अफ़सोस मानते हुवे.. नीरज कुमार



24 comments:

  1. अब एक ओर लेखक का उदय हो चुका है। बहुत बढ़िया लिखा।

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    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद...

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  2. चलो जी, ये भी इश्टोरी पढ़ ली। अब अगली भी लाओ। अभी पिछले ही महीने चकरौता होकर आए हैं सो एक्स्ट्रा मज़ा आ रहा है। हाँ, इतना जरूर है कि हम साहिया वाले रूट से ही आये गए थे।

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    1. लेखन जारी है सिंघल जी...
      आगें भी बहुत मज़ा आने वाला है...
      धन्यवाद...

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  3. बढ़िया डॉक्टर साब....

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  4. आपकी लेखनी से रुचिकर पढ़ने को मिला ।
    बहुत अच्छा लगा

    उम्र तो होगयी है फिर भी कभी आपके साथ चलने की
    कोशिश करूंगा ।

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    1. धन्यवाद तिवारी जी...
      उम्र कभी कहीं बंधन नही होती...

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  5. बहुत ही बढ़िया

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    1. धन्यवाद अमित जी...

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  6. बहुत बढ़िया भाई जी।
    आखिर दीप्ती को भी जाट बना दिया।

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    1. धन्यवाद...
      उनके कई नाम,उपनाम है...

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  7. लेव सेव खाव वाह एबी निमाड़ी मालवी मिक्सचर अच्छा लगता है कही भी पढ़ने को....जौनसार का यह इलाका बहुत खूबसूरत है बहुत कुछ पढ़ा है इसमे घूमने के लिए....कभी न कभी तो जाएंगे....बुधेर cave और मोयला डांडा के अगले भाग की प्रतीक्षा...

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    1. प्रतिक जी धन्यवाद...
      पुरा जौनसार प्राकृतिक समृद्धि से भरा हुवा है...
      मानसून के बाद कि रंगत भी कम नही होती होगी..
      अगला भाग भी शीघ्र ही आएगा...

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  8. चित्र ओर विवरण भूतभी शानदार
    लेव काजू खाओ

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    1. धन्यवाद पाटिल साहिब...

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  9. शानदार सफर 👌 अगले भाग की इंतजारी

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  10. सफर है सुहाना।
    उत्तराखंड है जाना।
    सुंदर यात्रा वर्णन

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  11. आपका बहुत बहुत धन्यवाद 😊👍

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  12. यात्रा ये भाग बहुत ही रोचक रहा । आपकी और नीरज भाई की आपसी नोक झोंक भी खूब रही ।

    बढ़िया लेखन और चित्र

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    1. धन्यवाद रितेश जी...
      और ये नोकझोंक पूरी यात्रा में यूँ ही चलती रही..
      उसका भी अपना मज़ा है..

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  13. बहुत सुंदर व्रतांत डॉ सहाब

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    1. धन्यवाद सर जी..

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