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Saturday, 7 July 2018

उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा-भाग-4 रहस्यमय मोइला टॉप और बुधेर गुफ़ा



भाग-4-
08 जून 2018
बुधेर फॉरेस्ट रेस्ट हाउस के बाहर..
08 जून 2018
समय सुबह के सात से भी ज्यादा हो गया था।तीनों कंबल मे ही पड़े हुवे थे।मौसम ठंडा ही था।सबसे पहले मैने ही उठ कर बिगुल बजाया।मेरे तैयार होते ही नीरज-दीप्ति भी उठ गए।
में जल्दी तैयार हो गया,तो सोचा चलों,नीचे चहलकदमी करते है।बाहर अभी काफी धुन्ध और कोहरा था।दूर दूर के नज़ारे देखने आया था।लेक़िन कुछ नही दिखा।दृश्यता 10-15 फिट तक ही थी।फिर भी मौसम बहुत अच्छा था।इधर उधर घूमते रहा।थोड़ी देर बाद होटल मालिक रोहन राणा भी बाहर दिख गए।
उन्हें देखते ही आलू पराठे की फ़रमाइश कर दी।लेक़िन जवाब नकारात्मक मिला।आज होटल की बुकिंग फुल है,रोहन जी उसी की तैयारी में लगे है।तो ऐसे में कब आलू उबालेंगे और कब पराठे बनेंगे।तो उन्हें ब्रेड़-चाय का नाश्ता ही बनाने को कह दिया।
8 बज़े के बाद नीरज-दीप्ति भी नीचे आ गए।रोहन भाई भी नाश्ता तैयार करने में लगें थे।नीरज ने उन्हें आज की योजना बता दी-" भाई जी मोइला टॉप जा रहे है।उधर घूम घाम कर आते है।फिर सामान लेकर टाइगर फॉल की तरफ जायँगे।
रोहन भाई ने मोइला टॉप की सारी जरूरी जानकारी दे दी और कह दिया ठीक है आप सारा सामान नीचे कहीं भी रख दीजिये।और निश्चिंत होकर जाइये।
बातों ही बातों में हमारा नाश्ता भी हो गया।
गाड़ी के इग्निशन वाले सॉकेट में तार के दोनों सिरे डाल दिये,हॉर्न की पों-पों से चैक किया कनेक्शन सही थे।
हम लोग सुबह 9 बज़े होटल से गाड़ी लेकर निकल गए।यहाँ से करीब 3 किलोमीटर तक गाड़ी से जायँगे। उसके बाद ट्रैकिंग शुरू होगी।इस 3 किलोमीटर के कच्चे रोड़ पर कोई ट्रैफिक नही था।तो नीरज की गाड़ी की अगली सीट दीप्ति ने संभाल ली।हाँ दीप्ति मोटरसाइकिल चला लेती है।मेरा मन था इन्हें बुलेट भी थमा दु,लेक़िन मौका नही मिला।
बीच मे ही एक जगह थोड़ी फोटोग्राफी की ओर आगे बढ़ गए।15-20 मिनीट मे ही बुधेर फॉरेस्ट हाउस आ गया।

बुधेर का यह फॉरेस्ट रेस्ट हाउस उत्तर भारत का सबसे पुराना फॉरेस्ट रेस्ट हाउस है।इसका निर्माण सन 1868 यानि ब्रिटिश शासनकाल मे हुवा था। देवदार के घने जंगल बीच फॉरेस्ट रेस्ट हाउस से लोखंडी गाँव तक का रोड़ कच्चा ही है।बारिश और बर्फ पड़ने पर निश्चित ही आना-जाना दूभर हो जाता होगा। 
बुधेर के फॉरेस्ट रेस्ट हाउस से ही मोइला टॉप का ट्रैक शुरू होता है।
मौसम अभी भी धुंध वाला ही था।ऐसे में दूर पहाड़ो के सुंदर दृश्य नही दिख पायंगे। में अपनी जिंदगी का पहला ट्रैक शुरू करने वाला था।ऐसे में मौसम निराश कर सकता था।लेक़िन यह बात तीनों को पता थी कि हिमालय के मौसम की रंगत बदलते देर नही लगती।
खैर यह मौसम भी बुरा नही था,ग़ुलाबी ठंडक के साथ बादलों का साथ था।
सुबह 9.15 पर हम तीनों बुधेर फॉरेस्ट रेस्ट हाउस से मोइला टॉप की 2.5 किलोमीटर की ट्रैकिंग के लिए रवाना हो गए।
बुधेर फॉरेस्ट रेस्ट हाउस की समुद्र तल से ऊँचाई 2550 मीटर है और मोइला टॉप की 2750 मीटर...मतलब कुल 2.5 किलोमीटर में 200 मीटर का ट्रैक है।यह मेरे जैसे नए ट्रैकर के लिए बिल्कुल आसान था।
मौसम ऐसा था कि,इसका आनंद तो आ रहा था।लेक़िन फोटोग्राफी की संभावना बहुत अधिक नही थी।फ़िर भी जहाँ कहीं कुछ अच्छा लगता शुरू हो जाते।चाहे वो देवदार के पेड़ो के बीच से पतली सी पगडण्डी हो या सुन्दर-सुन्दर फ़ूल...हर दृश्य को कैमरे में कैद करने की कोशिश कर रहे थे।खैर इसे कोशिश ही कह सकते है।क्योंकि किसी भी जगह की खूबसूरती को स्वयं उपस्थित हो कर महसूस करना और घर बैठे उसका चित्र दिखाना,दोनों मे बहुत अंतर है।
में आज पहली बार ट्रैकिंग कर रहा था,लेकिन स्पिति यात्रा का अनुभव था।तो मानसिक रूप से इसके लिए तैयार था,बाक़ी शारिरिक तौर पर भी कोई दिक्कत नही आई।बाक़ी नीरज साथ रहता है, तो में बेपरवाह हो जाता हूं,मालूम है जहाँ कहीं ग़लती करूँगा,वो तपाक से टोंक देगा।
सुबह सुबह तीनों तरोताज़ा थे।तो चलने की स्पीड ठीक ठाक थी।
अभी तक का पुरा रास्ता हल्की चढ़ाई वाला देवदार के घने जंगल के बीच,कभी पतली,कभी चौड़ी पगडण्डी वाला था।
वैसे में इससे पहले कभी देवदार के जंगलों में नही गया,लेक़िन कहा जाता है कि कानासर रेंज का पूरा क्षेत्र एशिया के सबसे घने देवदार के जंगल से आच्छादित है।
टॉप पर पहुँचते ही सारा नज़ारा बदल चुका था।अब हमारे सामने बहुत बड़ा घाँस का मैदान था।पहाड़ी भाषा मे इसे बुग्याल कहा जाता है।
इसी घाँस के मैदान में ही थोड़ी सी ऊँचाई पर एक प्राचीन कालीन मंदिर दिखाई दे रहा था।
तीनों उसी दिशा में चल दिये।
अभी सुबह के 10.15 बज़े थे।मौसम अब अपना रंग बदलने लगा था।हवा में ठंडक थी,हल्की हल्की धूप थी,धुन्ध भी कम हो रही थी।बिल्कुल हमारी चाहत के मुताबिक मौसम बदल रहा था।
परी मंदिर पर पहुँचे तो मंदिर की दुर्गति देखकर अंदाज़ा हो गया कि यह अतिप्राचीन ही है।वैसे मंदिर के अंदर तो कोई मूर्ति नही थी।लेक़िन मंदिर के दरवाज़े के बाहर एक लकड़ी की मूर्ति जरूर थी।यह मूर्ति किसकी है,यह स्पष्ट नही हो पाया।
माना जाता है कि यह मूर्ति द्वारपाल की है।जो कि बाहर पहरेदारी के लिए है।मंदिर का सम्बंध भगवान शिव और महासु देवता से भी किया जाता है।लेकिन सत्य क्या है ? हमें भी नही पता।
ग़ुमनाम मंदिर पर शीष झुकाकर हम तीनों बुग्याल में चहलकदमी करते हुवे आगे 
चल दिये।
हरे-भरे बुग्याल मे अगर औंस से गीली घाँस के ढलानदार मैदान दिखे और अगर आपके अंदर का बच्चा जिंदा है। तो आपका मन इन ढ़लानों से फिसलने का जरूर होगा। नीरज और में तो अन्तर्मुखी व्यक्तित्व वाले है,लेक़िन दीप्ति का व्यक्तित्व हम दोनों से बिल्कुल अलग है,घाँस का मैदान देखते ही उसका बचपन एक दम से बाहर आ गया और घाँस के ढ़लान से फिसलते हुवे दूर नीचे पहुँच गई।
खैर हमें तो अब बुधेर गुफ़ा भी ढूंढनी थी।इसकी खोज में हम प्राकृतिक तालाब से होते हुवे आगे चल दिये।दूर तक चले गए लेक़िन गुफ़ा का कही पता नही चला,नाही कही कोई बोर्ड या निशान दिख रहा था।तब पूरे बुग्याल पर हम तीनों के अलावा और कोई नहीं था,तो पुछते भी तो किस से पुछते।
कहीं कुछ पता नही मिला तो नीरज ने अपने किसी मित्र, शायद नफ़े राम जी यादव को फ़ोन लगा कर गुफ़ा का पता पूछा।उन्होंने इसकी जानकारी दे दी।
उन्होंने बताया-"जब मोइला टॉप आया था,तब मुझे भी गुफ़ा नही मिली थी लेकिन नीचे आकर पता लगाया तो किसी ने बताया कि गुफ़ा तालाब के बिल्कुल सामने नीचे की साइड है"।
नीरज को उस गुफ़ा का प्रवेशद्वार उधर से आते वक्त दिखाई तो दिया था लेकिन विश्वास नही हो रहा था कि यही गुफ़ा हो सकती है।
खैर अब हमें पता चल गया था।गुफ़ा देखकर ही जायँगे।
बुग्याल के एक बहुत ऊँचे टीले पर पहुँचे,तो तीनों ने अपना समान वहीं रख दिया।और पूरे परिदृश्य को देखते रहे।यहाँ से बुग्याल का सुंदर दृश्य,परि मन्दिर,प्राकृतिक तालाब,सब दिखाई दे रहा था।हल्की धूप के साथ हवा में ठंडक थी।बाक़ी यहाँ की सुन्दरता का क्या बखान करु,यह काम तो कोई कवि ही कर सकता है।
बैठे बैठे दीप्ति ने एक डब्बा निकाला और कहा डॉक्टर साहब आपने कल हमें नक़ली काजु खिलाये थे।आज आप यह लेव असली काजु खाव,और मैने लेकर देखा तो सच मे असली काजु-बादाम और किशमिश थे।
सुन्दर परिदृश्य के साथ सुहावना मौसम और असीम शांति...इस जगह पर पहुँच कर,रुकना लाज़वाब था। विशुद्ध प्राकृतिक जगह जहाँ मानव निर्मित कुछ नहीं..केवल रहस्यमय परी मंदिर ही इसका अपवाद था।
धीरे धीरे इस दृश्य को निहारते निहारते वहीं बैठ गए।हम इस एकांत में ओर खोना जाना चाहते थे। तो में और नीरज वहीं घाँस के बिस्तर पर लेट गए।
यह दुनिया मेरे लिए सपनों की दुनियां थी।मुझे मालूम है कि कहीं न कहीं इससे भी खूबसूरत जगह होगी। लेक़िन दो प्राकृतिक खूबसूरत जगहों की तुलना करना मुझे पसंद नही।
हम यहाँ बंद आँखों से एकांत में खोए थे और दीप्ति अपने मोबाईल में सदाबहार नग़मे चालू कर खुली आँखों से इस जगह की साक्षी बन रही थी।सब अपने अपने में खोए थे।और बस वही ठहर से गये थे।लेक़िन वक़्त कभी भी ठहरता नही है।
दोपहर के 12.30 बज़े वहाँ से उठना ही पड़ा।अभी हमें बुधेर गुफ़ा भी देखना थी,तो तालाब किनारे पहुँच कर नीचे की ओर चल दिये।थोड़ा नीचे उतरते ही गुफ़ा का प्रवेश द्वार सामने दिख गया।
वैसे इस जगह के कई नाम है।जैसे मोइला डांडा, मोइला टॉप,मोइला बुग्याल,बुधेर गुफ़ा,मोइला टिम्मा।हर नाम में मोइला और बुधेर कॉमन है।बड़ी उत्कंठा थी कि यह नाम क्यो है और इस जगह का क्या इतिहास है।क्योंकि की सब कुछ अतिप्राचीन है।कुछ भी नया नही है।
जब खोजबीन की तो पता चला कि इस जगह को पहली बार ब्रिटिश वाइल्डलाइफ फ़ोटोग्राफ़र बोथर ने अपनी जर्मन महिला मित्र मिओल के साथ घूमते घामते जीव-जन्तु के चारहगाह के रूप में खोजा था।और जब बाद मे सर्वे हुवा तो उन दोनों के नाम पर ही इस जगह का नामकरण हो गया।लेक़िन उस नामकरण का अपभ्रंश होते होते यह बोथर से बुधेर और मिओल से मोइला हो गया।
और जो परी मंदिर है उसे भी मिओल और बोथर का हट माना जाता था,इसीलिए परी मंदिर नाम पड़ा।
हम जिस गुफ़ा के बाहर खड़े थे,उसका प्रवेश द्वार संकरा था।दीप्ति को सारा सामान देकर नीरज और में अंदर जाने की कोशिश करने लगे,नीचे झुककर थोड़ा थोड़ा आगे बढ़े, लेक़िन खड़े रहने लायक जगह भी नही थी।नीचे कीचड़ था और सर के ऊपर पानी भी टपक रहा था। घुप्प अंधेरे में मोबाइल की रोशनी से 10-15 फिट भी नही गए और वापस आ गए।
वैसे बताया जाता है यह गुफ़ा आगें बढ़ने पर खुली है और आराम से खड़े रहने लायक जगह भी है,इसकी लंबाई 150 किलोमीटर तक बताई जाती है।ब्रिटिश शासन काल मे बहुत सर्वे भी हुवे है।
गुफ़ा का इतिहास महाभारत युग से भी जोड़ा जाता है।अवधारणा है कि पांडवो को लाक्षागृह (लाखामंडल) से बाहर इसी गुफ़ा से निकाला गया था। खैर अभी तक इस गुफ़ा के लाक्षागृह तक होने की पुष्टि नही हुई है।
जब हम गुफ़ा से बाहर निकले,तब परि मन्दिर से नीचे आता हुवा एक पारिवारिक समूह दिखाई दिया,जब वो लोग यहाँ आकर बैठे तो पता चला कि जयपुर से आये है। नीरज उनसे चर्चा मे लग गया। मैने सोचा मौका बढ़िया है..वही रुमाल मुँह पर डालकर लेट गया।
नीरज मे किसी भी अनजान शख्स से खासतौर पर यात्रा के दौरान, संवाद स्थापित करने का बहुत बढ़िया गुण है।यह संवाद काफी लंबा चला,एक बार तो हमने बाय बाय भी कर लिया लेक़िन फिर बाते शुरू हो गई,इस चक्कर मे वह पीछे रह गया।
बाद में बता रहा था कि इन लोगों के आगे की यात्रा के लिए कई बढ़िया रास्ते बताये है..उनके कई किलोमीटर बच जायँगे।
दोपहर के 1.10 बज़े मोइला टॉप को अलविदा कह कर हम तीनों ने नीचे उतारना शुरू कर दिया..उतराई और समतल रास्ता था। तो आराम से नीचे उतर रहे थे रास्ते मे ही एक घुमन्तु जोड़ा मिला,महिला की हालत ठीक नही लग रही थी,पुरूष ने पूछा भाई रास्ता और कितना बचा है ? रास्ता सेफ तो है ? टॉप पर पहुँचने पर कैसा सीन है ?
मैने कहाँ-रास्ता अब आधा भी नही बचा है..रास्ता बिल्कुल सेफ है।और ऊपर पहुँच कर शानदार नज़ारा दिखेगा..
वो लोग पूछकर आगे बढ़ गए।
बाद में पीछे से नीरज की आवाज़ आई..हमारा गाइड कैसा हो ? तीनों ने तेज आवाज़ में नारा लगाया..डॉक्टर साहब जैसा हो।
नीचे फॉरेस्ट रेस्ट हाउस पहुँचने में हमें 40 से 45 मिनीट ही लगे।सुबह 9 बजे से पहले नाश्ता किया था।अब घड़ी में 3 बजने वाले थे।दीप्ति को ज़ोर की भूख लगी थी,मुझें भी थोड़ी भुख लगी थी,भुख नीरज को भी लगी होगी,लेकिन समय बहुत हो गया था और आज टाइगर फॉल भी पहुँचना था,इसलिए उसका आगे कही खाने का मन था।लेक़िन बहुमत नाम की भी कोई चीज होती है।बुधेर वन विभाग के छोटे से रेस्टोरेंट पर तीनों आराम से बैठ गए।
अंदर जाकर खाने का पूछा तो मैगी,कोल्ड्रिंक,चाय,चिप्स की उपलब्धता मिली।चारों चीज़ो का ऑर्डर कर दिया।चिप्स कोल्डड्रिंक तो तुरंत मिल गये,तो हम तीनों शुरू हो गए। बाद में चाय-मैगी भी आ गई,मैगी अत्यंत स्वादिष्ट बनी थी,हरी मिर्ची,टमाटर, प्याज़ का झोंक देकर बनाई गई थी।
लेक़िन नीरज ने मैगी खाने से इंकार कर दिया,बहुत बोला फिर भी नही खाई,शायद वो फ़्री की मैगी ही खाता है,और यहाँ तो सारा ख़र्च उसे ही देना था।
खैर यहाँ भी तीनों कहीं न कहीं की पंचायत में लगें थे।घड़ी देखी तो होश आया,अब चलना भी है।
डिस्कवर गाड़ी दीप्ति ने ले ली और बुलेट पर नीरज ने हाथ आजमाए और बुलेट की पिछली सीट पर में बैठ गया।
और चल दिये आगें की यात्रा पर....
अगला भाग-उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग - 5 
अब कुछ फ़ोटोग्राफ़...


फारेस्ट रेस्ट हाउस से दूरी..मोइला टॉप की।

सुबह जाते समय..का नज़ारा..

देवदार वन में एक मुसाफिर..





अब कुछ नज़ारे फूलों के...






परी मंदिर.. बहार एक लकड़ी की मूर्ति है,उसके अलावा अंदर कोई मूर्ति नही है।



 मोइला बुग्याल, प्राकृतिक तालाब,और दूर चोटी पर दिखता परी मंदिर, तालाब के बाईं तरफ नीचे बुधेर गुफ़ा है।

कुछ दृश्य बुग्याल के...














 अच्छा जी में हारी चलो मान जाव ना...

पेट अंदर..साँस बाहर..


विथ भोलाराम जी..




यात्रा का सबसे बड़ा कलाकार..



पता नही कोई से कीड़े..

 बुधेर गुफ़ा.. अंदर जाने का संकरा सा रास्ता..


नीरज जयपुरी घुमक्कड़ों को आगें का मार्ग समझाते हुवे,तब तक में क्या करूँ..आँख बंद कर के पड़ जाता हूं।

 पता नहीं क्या मंत्रणा कर रहे है,ये दोनों..


 छायाकार-दीप्ति

हम आ गए तब भी मीटिंग जारी थी।

वापसी...


वापस आते ही सबसे पहले थोड़ा नाश्ता..


यही है वो...अति स्वादिष्ट मैगी...
यहाँ से आगें... टाइगर फॉल की यात्रा
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग - 5 

28 comments:

  1. पड़कर मज़ा आया, कैप्शन बहुत ही जबरदस्त लगाए है आपने। और बुग्याल के फोटो भी बहुत खूबसूरत है

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    1. धन्यवाद चौधरी जी...
      इतने बढ़िया पोज़ मिल जाये तो फिर कैप्शन का क्या है..
      केवल रिक्त स्थान भरने जितना काम रह जाता है।

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  2. बहुत ही अच्छी यात्रा ब्रदर, आपकी बाइक मैं प्रॉब्लम होने की बात पड़ने से,उस time आप क्या सोच रहे होंगे उस प्रॉब्लम को भी feel किया, इसी तरहा मेरी bike के tyre में भी yamunotri के रास्ते मैं problem हो गयी थी ओर वापसी मैं leopard गुलदार से सामना की घटना भी हुई

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    1. 18:15
      धन्यवाद गौरव जी...
      उस वक़्त में थोड़ा सा पैनिक हो गया था..
      लेक़िन साथी-नीरज अनुभवी था। उसकी वजह से माहौल बिल्कुल हल्का रहा..
      मस्ती मज़ाक में गाड़ी ठीक भी हो गई..
      बाकि अगर हम गाड़ी ठीक नही भी कर पाते तो 16 किलोमीटर पीछे चकराता से मैकेनिक लेकर आते..यह भी सोच लिया था।

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  3. marvellous photographs, Three salute to your adventurous will and zeal.Enjoyed extremely.
    May I know which camera u used for fabulous photography, it's brand and model.

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद गोयल जी...
      कैमरा सोनी HX400V है।

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  4. शानदार वर्णन और फ़ोटो भी ग़ज़ब।

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    1. धन्यवाद निरंजन जी...

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  5. बहुत ही सुंदर लेखन,मज़ा आ गया
    सारे फ़ोटो बहुत ही शानदार
    बहुत बढ़िया dr. साहब....

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी..

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  6. बहुत बढ़िया डॉ साब।
    फ़ोटो के कैप्शन बढ़िया लगाये हैं।
    लेखनी भी मस्त है। लगता है संगती का असर हो रहा है।

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    1. धन्यवाद...
      हाँ संगति का असर जरूर हो रहा है।

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  7. बहुत बढ़िया लिखा है शर्मा जी, फ़ोटो भी बहुत सुंदर हैं

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  8. ऊपर जाने में कितना समय लगा

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    1. धन्यवाद पाठक जी...
      ऊपर जाने में 60 मिनीट..
      3 घंटे वहीं रहे..
      वापस आने मे 45 मिनीट आने में..

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    2. कौन सा कैमरा यूज़ किया है

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  9. धन्यवाद शर्मा जी, ये तो मैं आपकी लिंक से यहां पहुंचा, गर डायरेक्ट आना हो तो क्या करना चाहिए, आप अपनी फोटो पर वाटरमार्क कैसे लगाते हैं।

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  10. सर जी कैमरा तो SONY HX400V है।
    वाटरमार्क के लिए गूगल प्ले स्टोर से कई ऐप्प मिल जाते है।
    में LOGO LICIOUS एप्प का उपयोग करता हु।
    बाकी डायरेक्ट ब्लॉग पर आने के लिए ब्लॉग एड्रेस sumitsharma21.blogspot.com
    इस लिंक को सेव या बुकमार्क्स कर के रख लिजीये।

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  11. बुधेर गुफा के बारे में बहुत मस्त जानकारी और स्पेशली वो बोथर की प्रेम कहानी वाली....कुल मिला कर मजा आ रहा हैं... आपके साथ घूमने में

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    1. धन्यवाद प्रतिक जी..
      तब तो सफ़र गंगोत्री और फिर इंदौर वापसी तक जारी रखेंगे...

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  12. वाह देवदार के वृक्ष,हरा भरा बुग्याल , वाह गाइड साहब 😀

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  13. सही है...धन्यवाद भाई जी

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  14. लाजवाब यात्रा और शानदार लेखन डॉ साहब

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद महेश पालीवाल जी आपका।

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  15. यात्रा वर्णन शानदार चल रहा है । फोटो बहुत अच्छे आये है

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  16. बहुत बढ़िया लिखा है डॉक्टर साहब

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    1. चौहान जी धन्यवाद..

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