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Thursday, 19 July 2018

उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा-भाग-6 टाइगर फॉल - लाखामंडल - राढ़ी टॉप


भाग-6 09 जून 2018 स्थान- टाइगर फॉल


09 जून 2018
कल रात को दारूबाजों से भिड़ने के चक्कर मे 2 बज़े के बाद ही नींद लगी। सोचा था देर तक सोऊंगा,लेकिन नींद सुबह 7 बज़े के बाद ही खुल गई। तैयार होकर बाहर देखा तो धीमी बारिश हो रही थी,बादल भी छाए हुवे थे।
थोड़ी देर मे बारिश रुक गई तो रोड़ पर चहलकदमी करने आ गया। कुछ परिदृश्य के,कुछ मोटरसाइकिल के,कुछ खुद के फ़ोटो लेता रहा।
गाँव वाले एक भाई साहब भी वहीं खड़े थे,रात वाले झमेले की थोड़ी गुफ़्तगू होने लगीं,फिर उन्होंने अपने काम की बात की- आप जब यहाँ से जायँगे तो मुझें पास वाले गाँव तक मोटरसाइकिल पर बिठाकर ले चलेंगे क्या ?
मैंने कहा - हाँ ठीक है,ले तो जायँगे लेक़िन अभी साथी तैयार हो रहा है,फिर नाश्ता करेंगे, फिर जब मन होगा निकलेंगे।
भाई साहब को भी कोई जल्दी नही थी,उन्होंने कहा- हाँ ठीक है। में यहीं बैठा हूँ।
इतने में अंकल जी ने आवाज़ लगा कर कहा.. आ जाइये.. आलु पराठा तैयार है। मैंने भी इसी तरह नीरज को आवाज़ लगा थी। आलु पराठा सुनते ही नीरज को आने मे ज्यादा देर नही लगी।
आलु पराठा,चाय,दही अचार सब कुछ हमारें सामने था। लेक़िन फिर भी कुछ कमी लग रही थी। तो अंकल ने कहा- मख्खन दु क्या ?
तीनों ने एक साथ कहा - हाँ-हाँ-हाँ
आलु पराठे के साथ मख्खन का तालमेल जम गया..
नाश्ते के साथ मे रात के कांड की गपशप भी चल रही थी। नीरज ने मोबाइल में रात मे जो वीडियो बनाई थी उसे देखने के लिए अंकल जी ने उत्सुकता दिखाई तो उन्हें मोबाइल दे दिया,सब लोग अपना अपना काम छोड़कर वहीं खड़े हो गए।
इस सब के बीच जब देखा कि 11 बज गए है,तो निकलने की तैयारी शुरू कर दी,अंकल जी का हिसाब किया और रेनकोट भी पहन लिया क्योंकि हल्की बारिश हो ही रही थी। नीरज-दीप्ति एक गाड़ी पर और में और गाँव वाले भाई साहब एक गाड़ी पर लाखामंडल के लिए चल दिये।
पास के गाँव मे ही वो उतर गए।
टाइगर फॉल से लाखामंडल का रोड़ बढ़िया सिंगल लेन है। दूरी केवल 50 से 55 किलोमीटर के बीच। पूरा रास्ता बेहद खूबसूरत,साथ मे बढ़िया मौसम इसकी खूबसूरती को और उभार रहा था। कभी धुन्ध तो कभी बारिश की फुंवारे, कभी लगता कि बादलों के बीच है,यूं हाथ उठाने पर इन्हें पकड़ लेंगे। मेरे मानस पटल पर मेघालय, पश्चिमी घाट सब कुछ आ गया, लग रहा था उस क्षेत्र की खासियत है यह तो,और इसे में आज यहाँ महसूस कर रहा हु।
मार्ग की खूबसूरती ही ऐसी थी कि हम बेहद थिमी गति से चल रहे थे। दोपहर 12 के आसपास एक जगह चाय के विश्राम के लिए रुक गए। शायद जगह का नाम कुंसी होगा।
सबसे पहला रिफ्लेक्शन क्लिक..इसके बाद तो इसकी रोज़ प्रैक्टिस शुरू करता रहा..

उसके बाद बारिश भी थम गई थी लेकिन मौसम सुहावना ही था। अब तो कैमरा निकाल कर इस घाटी की खूबसूरती को कैमरे में भी कैद कर सकते थे। ऐसे ही कंदीधर गाँव के आसपास एक जगह पर पहाड़ी परिदृश्य में गाड़ी के साइड ग्लास को फ़ोकस का के कुछ फ़ोटो लिए,इसके परिणाम बहुत बढ़िया आये। फिर तो मैने इस तरह के फ़ोटोग्राफ़ की हर रोज़ प्रेक्टिस शुरू कर दी।
दीदी पहले ये बताव.. आप लड़का हो या लड़की..?

हम लोग रुकते रुकाते आगे बढ़ते जा रहे थे।पोखरी होते हुवे गोराघाटी पहुँचने मे दोपहर के 1 बज़ चुके थे। यहाँ कुछ बच्चे पानी भर रहे थे। कैमरे के आकर्षित होकर वे हमारें पास आ गए। कुछ देर शर्माते रहे और फिर दीप्ति से पूछने लगें..आप लड़की है क्या..? शायद उन्हें महिलाओं की इस वेशभूषा को देखने का मौका कम ही मिलता होगा..तभी यकीन नही हुवा।
यहाँ पूछने पर पता चला की यहाँ से लाखामंडल पहुँचने के दो मार्ग है। एक पर ख़राब सड़क है,दूसरा मार्ग थोड़ा लंबा लेक़िन बढ़िया सड़क वाला है। दोनों मार्ग एक टी पॉइंट से विभक्त होते है। हम लोग अच्छी सड़क यानी टी पॉइंट से बायीं रोड़ पर चल दिये।
सुन्दर राहें..

बढ़िया रोड़ और बढ़िया दृश्यों का मोहपाश ऐसा था कि मोटरसाइकिल चलाने में मन ही नही लग रहा था। मन कर रहा था बस एक जगह ठहर कर बैठ जाये। और वक़्त को कह दे- ओ रे लम्हें तू कहीं मत जा,हो सकें तो उम्र भर थम जा.. लेक़िन देर बाद वक़्त और हम फिर से चल दिये। नतीज़न अब यमुना नदी दिखने लगी थी। अभी तक हम टोंस घाटी क्षेत्र में थे,अब हम यमुना घाटी में प्रवेश करेंगे।
दूर ऊँचाई से यमुना नदी और इसके तट पर बसे लाखामंडल क़स्बे का अवलोकन करने के बाद जब हमनें लाखामंडल के प्राचीन शिव मंदिर के बाहर गाड़ी रोकी,तब घड़ी में समय 3 बज़ने को थे।
रोड़ से कुछ कदमों की दूरी पर ही प्राचीन शिव मंदिर है। कुछ सीढ़ियों से चढ़कर जब थोड़ी ऊँचाई पर मंदिर में प्रवेश किया तो चारों ओर बढ़िया दृश्य दिख रहा था। मंदिर की परिसीमा काफी बढ़ी है,सामने ही बैठ कर एक ढोली अपने ढ़ोल पर धीमी धीमी थाप दे रहा था। सबसे पहले मुख्य मंदिर में दर्शन किये।
मंदिर से बाहर निकलते ही एक वृद्ध व्यक्ति हमारे साथ हो गए और हमें मंदिर के बारे में समझाने लगें।
उन्होंने सबसे पहले मंदिर के नक्शे के बारे में बताया कि इसका नक्शा भी उत्तराखंड के पंच केदार की हुबहू नक़ल है। इस मंदिर का निर्माण और यहाँ पर अनेक शिवलिंगो की स्थापना महाभारत काल मे पांडवों ने की थी। और अपने अज्ञातवास के दौरान यहाँ भी रहे थे। मंदिर के बाहर ही ख़ुदाई के दौरान मिले कुछ शिवलिंग खुले में ही रखे हुवे थे,हमारे साथ गाइड की भूमिका में घूम रहे व्यक्ति ने बताया यह शिवलिंग द्वापरयुग और त्रेतायुग के है।
जब इस मंदिर की खोज की बात की तो वे बताने लगें - इसकी खोज एक गाय ने की थी। वो यहाँ घास चरते हुवे विचरण कर रही थी,किसी को जब नीचे कुछ दबे होने का निशान मिलें और फिर खुदाई की गई तो एक के बाद एक चीज़े मिलने लगी। वैसे मैंने कही पढ़ा था कि किसी संत महाराज जी को सपना आया था इस जगह पर मंदिर के होने का,फिर उन्होंने कुछ लोगों को साथ लेकर खुदाई की तो यह मंदिर और शिवलिंगों का समुह उजागर हुआ।
मंदिर के बाहर ही मूर्त रूप मे दो द्वारपाल भी खड़े दिखे,इनमें से एक द्वारपाल देव और दूसरे 
का दानव का होना बताया गया।
मंदिर परिसर में ही अनेक शिवलिंग थे,ऐसे ही एक चबूतरे पर विराजित शिवलिंग के बारे में बताते हुवे हमारे गाइड बताने लगें कि इस ओटले के नीचे बहुत धन/स्वर्ण है,अंग्रेज़ो ने अपने शासनकाल के दौरान इस जगह खुदाई करने की कोशिश भी की,लेक़िन साँप अजगरों ने उन्हें ऐसा डराया की यह काम उन्होंने वहीं रोक दिया।
वहाँ से पास में ही एक और विशिष्ट शिवलिंग के दर्शन किये,इस शिवलिंग की विशेषता यह है कि इस पर जल अर्पण करने पर दर्पण की तरह ही अपना प्रतिबिंब हमें शिवलिंग में दिखाई देती है। ऐसा ग्रेनाइट पत्थर की चिकनी सतह और सामने से मिलते प्रकाश के कारण ही होता होगा। यहाँ पर एक छोटा सा बालक किसी प्रखर कर्मकांड विशेषज्ञ की तरह मंत्र बोले जा रहा था,और हम मंत्र की थाप पर जलाभिषेक कर रहे थे।
अब हमारे गाइड महोदय कुछ अपने बारे में भी बताने लगे कि वे पहले सीमा सुरक्षा बल के सिपाही रह चुके है,बांग्लादेश युद्ध के बाद उन्होंने किसी कारण से नोकरी छोड़ दी,अब यही गाँव मे खेती करते है। फिर वे बताने लगे कि यहाँ की एक और विशिष्ट परम्परा रही है। वो यह कि- आसपास के 24 गाँवो में जब किसी की मृत्यु होती थी तो शव को इसी परिसर में रखा जाता था,पंडित लोग जैसे जी उस शव पर मंदिर के पवित्र जल का छिड़काव करते थे,वैसे ही कुछ देर के लिए शव में वापस जान आ जाती थी,फिर उसे गंगाजल पिलाया जाता था। इस प्रक्रिया के बाद शव की आत्मा शरीर से फिर अलग हो जाती थी,और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती थी। खैर इन बातों में पता नही कितनी सच्चाई है ?
जब पूरा परिसर घूम लिए तो एक जगह बैठ गए। पास ही एक ग्रुप किसी दूसरे गाइड के साथ घूम रहा था,उन्हें देखकर हमारें साथ बैठे महोदय कहने लगे वो गाइड बहुत झुठी कहानियां सुनता है। अभी वो उन्हें बता रहा होगा कि यह जगह ही लाक्षागृह है और यहीं कौरवों ने पांडवों को लाक के भवन मे जला कर मार देने का स्वांग रचा था जबकि असली लाक्षागृह तो बरनावा/बागपत (उत्तर प्रदेश) के पास है। यह सही भी है,लाखामंडल और लाक्षागृह दोनों जगहें अलग अलग है।
अब तक हम पूरा मंदिर परिसर घूम चुके थे। हमारें साथ मे गाइड की भूमिका में घूम रहे वृद्ध व्यक्ति से हमने अलविदा कहा और 50 रूपए दे दिए,हालांकि हमनें उनसे नही कहा था साथ रहने को,लेक़िन फिर भी ये सब वो पैसों के लिए ही तो कर रहे होंगे।
जाते जाते कुछ फ़ोटोग्राफ़ एक दूसरे के भी लेने जरूरी थे,आखिर हम एक ऐतिहासिक स्थल पर थे।
मंदिर से बाहर आते ही एक सुविधाघर दिखा तो में अंदर चले गया,पीछे पीछे नीरज भी आने लगा, में बाहर आया तो दो बच्चे बाहर खड़े थे,कहने लगे 5 रूपए शुल्क दीजिये। मैंने 10 रुपये दे दिए और कहा एक और अंकल गए है उनका शुल्क भी रख लो। लेक़िन जब गाड़ी के पास गया तो नीरज तो यही खड़ा था,उससे पूछा तो कहने लगा सुविधाघर में शुल्क की तख़्ती देखते ही वापस मुड़ गया,अंदर गया ही नहीं। मैंने कहा जाव काम निपटा के आव तुम्हारा शुल्क भी दे आया हु..वो कहने लगा अबे तुम जाव और रूपए वापस लेकर आओ..में इन कामों को शुल्क देकर नही करना चाहता। खैर दोनों ही वापस नही गए।
यह वाली बहस जल्दी से ख़त्म की ओर गाड़ी स्टार्ट कर के आगे को चल दिए।
सुबह के नाश्ते के बाद केवल एक बार चाय ही पी थी। और अब शाम के 4 बज़ने वाले थे। निश्चित ही तीनों को भूख लग रही थी। लाखामंडल से यमुना नदी पर बने पुल को पावर करते ही नदी किनारे छोटी छोटी दूकानों पर रुक गये। मैंने अपने मोबाइल में देखा तो नेटवर्क बढ़िया था,तो श्रीमती जी को फ़ोन लगाकर बातें शुरू ही की थी कि नीरज आ गया,और कहनें लगा..अबे तुम यहाँ फोन पर लगें पड़े हो चलो उधर बताव खाने में क्या लोगे। मैंने कहा इन सवालों से बचने के लिए घर से निकला हु और तुम हो कि मुझें यहाँ भी फंसा रहे हो..ले लो जो भी कॉमन हो...
नीरज चिढ़ने का नाटक करके...बावर्ची से कहने लगा..भाई एक काम करो डॉक्टर के लिए एक समोसा और थोड़े चावल को मिला कर उनमे छोले चटनी अचार डालकर दे दो। यहीं है ना कॉमन तो...
खैर ऐसी नोंक झोंक चलती ही रहती है,में भी इन पलों का मज़ा लेता हूं...
मैंने कहा बस करो..महाराज..
में तो छोले चावल खा लूंगा..
दीप्ति और मैंने छोले चावल और नीरज ने उसका अतिप्रिय समोसा ले लिया..
खाना ख़त्म होते ही होटल वाले से नीरज ने यहाँ से उत्तरकाशी के मार्गों की जानकारी ली तो पता चला हम लोग जिस राढ़ी टॉप तक हम जिस गैर परम्परागत मार्ग (बरनीगढ़-तियां-राढ़ी टॉप) से जाने वाले है वह रास्ता सुनसान जंगल वाला है,जबकि बड़कोट होते हुवे राढ़ी टॉप वाले परम्परागत मार्ग पर ट्रेफ़िक होते हुवे भी राढ़ी टॉप जल्दी पहुँचा जा सकता है।
और अब जल्द ही शाम होने वाली है,ऐसे मे जंगल वाले मार्ग के बजाय सामान्य मार्ग से ही जाना उचित समझा और विकासनगर-बड़कोट रोड़ पर बड़कोट की ओर चल दिये। खाने के बाद थोड़ा आलास भी आ रहा था लेक़िन चलना तो था ही,तो चले जा रहे थे।
लाखामंडल से बड़कोट के पूरे मार्ग पर हम युमना नदी के साथ साथ आगें बढ़ रहे थे। बड़कोट के बाद यमुना नदी और हमारा साथ छूट जाता है। बड़कोट से हम राढ़ी टॉप-धरासू के लिए चल देते है। 
बड़कोट एक बड़ा क़स्बा है और यहीं से उत्तरकाशी,यमनोत्री और देहरादून मार्ग विभक्त होते है,तो बसों का थोड़ा ट्रैफिक रहता है। मेरे जैसे पहाड़ो में गाड़ी चलाने के अनुभव शून्य व्यक्ति के लिए किसी बस या बड़े वाहन के पीछे कई किलोमीटर चलते रहना थोड़ा कठिन हो जाता है..और ऐसे ही एक बस के पीछे चलते हुवे में बस से आगे निकलने की जल्दबाजी करने लगा। उस वक़्त नीरज बाबू मेरे बिल्कुल पीछे ही चल रहे थे। उनकी मैडम जी के हाथ मे छोटा कैमरा तो हर वक़्त रहता ही है। फिर क्या था,बन गई हमारी रश राइडिंग की वीडियो..
वो वीडियो जब नीरज ने मुझें जब दिखाई तो अपने आप पर मुझें बहुत गुस्सा आया। नीरज ने उस वक़्त एक बात कही..कभी भी ओवरटेक मत करो..ओवरटेक होने दो..पीछे वाले को ज्यादा जल्दी है तो उसे साइड दे दो..और जब आपके आगे चल रहे वाहन के पास जब जगह होगी तो वो खुद तुम्हें इशारे से निकलने का कहेगा। खुद आगें निकलने की जल्दबाजी कभी मत करो। नीरज पहाड़ों मे हजारों किलोमीटर गाड़ी चला चुका है। उसका अनुभव मायने रखता है।
नीरज के समझाईश दिमाग मे घर कर गई।
धन्यवाद दोस्त।
बड़कोट के बाद से ही हम चढ़ाई वाले रास्ते पर चल रहे थे। राढ़ी टॉप पहुँचे तब शाम के 6.30 हो चुके थे। टॉप पर उत्तरप्रदेश की मोटरसाइकिल पर सवार कई बाइकर दिखे शायद चार धाम की यात्रा पर निकले होंगे। हम यहाँ रुके ही थे तो चाय पीने का भी मन हो गया।
एक दुकान पर चाय का कहा और यही चहलकदमी करने लगे। हवा बहुत तेज़ चल रही थी,चौराहे पर ही भारतीय ध्वज लहरा रहा था।बहुत अच्छा दृश्य था। तभी अचानक कहीं से लड़ाई झगड़े की आवाज सुनाई दी,चाय वाले से पूछा क्या मामला है भाई..तो बताया- अरे एक शराबी पास के मंदिर में शराब पीकर  बैठ गया है,पंडित गांजे के नशे में शराबी को भगा रहा है। दोनों ही नशेड़ी है,उनका तो ये रोज का ही किस्सा है।
कुछ देर बाद शराबी उसी दुकान पर हमारे सामने आ गया। देखने से वो वन विभाग का कर्मचारी लग रहा था। चाय वाले ने इसकी पुष्टि भी कर दी। लेक़िन उसका नाम नही बताया। नीरज ने कैमरे और मैंने मोबाइल में उसकी रिकार्डिंग कर ली।
जब राढ़ी टॉप से निकले तो समय बहुत ज्यादा हो गया था,उत्तरकाशी की दूरी अभी भी 65 किलोमीटर थी। कुछ देर बाद अंधेरा होने लगेगा,ऐसे में उत्तरकाशी पहुँचने में देर रात हो जायेगी। यह बात तीनों को पता थी। तो निर्णय लिया गया कि जो भी पहला होटल मिलेगा वहाँ रूम ले लेते है। रोज की तरह यह जिम्मेदारी मेरी और दीप्ति की थी।
राढ़ी टॉप से क़रीब 5 किलोमीटर बाद ही वान के पहले समुद्र तल से 2000 मीटर ऊँचाई पर बढ़िया लोकेशन पर एक साधारण होटल या यूँ कह मानिए की घर दिखाई दिया। बाहर ही होटल मालिक बैठे हुवे थे। में खुद ही रुकने वाला था,फिर भी उन्होंने भी रूकने का इशारा कर दिया..
कमरा चाहिए क्या..
मैंने कहा- हाँ भाई जी...
ये देखिए इन नीचे वाले 2 बेड वाले कमरों में कॉमन लेट-बाथ है।
और वो ऊपर वाले 3 बेड कमरों में अटैच लेट-बाथ है। लेक़िन वो थोड़े महंगे है।
मैंने कहा- बताईये तो सही, कितने महँगे है..?
3 बेड वाला 800 का है...
हाँ भाई जी यह बहुत महँगा है..एक काम करो 600 में दे दो..और ये सामने वाला रेस्टोरेंट आपका ही है ना..हम यही खाना खायंगे...
ये हिमालियन गाँवो के लोग बहुत प्यारे होते है। वो भाई ने मुस्कुरा कर हामी भर दी..
नीरज नीचे ही खड़ा था। दीप्ति ने कमरे का मुआयना कर लिया था। में नीरज के पास गया..उसने कहा..सिर्फ़ इतना बताव हाँ या ना..? मैंने कहा हाँ..
दोनों गाड़ी से सामान खोलने लग गए। होटल वाले के छोटे से भतीजा नीरज की मद्दद करने लगा,इसी चक्कर में वो डिस्कवर के मोडिफाइड बेकरेस्ट पर लटक गया..नतीज़न बेकरेस्ट टूट कर हाथ मे आ गया। बच्चे को दोनों ने बहुत प्यार से फटकार लगाई।
सामान कमरे में रखने के बाद हम तीनों ने मोबाइल देखे तो किसी का भी नेटवर्क नहीं था। इस कारण में और नीरज हताश हो गए। दीप्ति खुश थी,चलों आज फिर बैठकर कहीं की पंचायत करेंगे। नीरज मुझें कोंसने लगा...तुमको यहीं जगह मिली थी..पहले मोबाइल नेटवर्क चेक करना था..फिर कमरे की बात करते।
नीचे होटल वाला हमारी बातें सुन रहा होगा..
क्या हुआ भाई जी..अगर जरूरी फ़ोन लगाना हो तो हमारें बी.एस.एन.एल फ़ोन से लगा लेना..और इंटरनेट चलाना हो तो पास में थोड़ा ऊंचाई पर मंदिर है..वहाँ सभी नेटवर्क बढ़िया मिलते है..वहाँ जायँगे तो आपके मोबाइल का इंटरनेट चलने लगेगा।
मुझें घर पर फ़ोन लगाना था। और नीरज को व्हाट्सएप-फेसबुक चलाने थे। तो नीरज और में उस प्यारे से बच्चे (अनुराग) यानी होटल वाले के भतीजे को लेकर चल दिये। क्या जमाना आ गया है। हम फेसबुक-व्हाट्सएप चलाने के लिए मंदिर जा रहे थे।
रास्ते मे अनुराग का पूरा नाम पूछा सरनेम सहित तो वो कहने लगा मेरा नाम अनुराग जाड़ा है। हमनें कहा अबे बच्चे तू इतना पतला है..नाम रख लिया जाड़ा..बड़ा अजीब है तू..
मसखरी चलती रही और मंदिर भी पहुँच गए।मंदिर के बाहर बैठे पुजारी जी से जय भोले और अंदर विराजित मूर्ति के दूरदर्शन कर अपना काम करने बैठ गए। मैंने घर फ़ोन लगाया,बढ़िया बात हो गई। नीरज से पूछा चला लिया भाई फेसबुक-व्हाट्सएप...तो कहने लगा अरे स्पीड़ नही है..चलो यार वापस...
अनुराग से बतियाते बतियाते वापस आ गए।
ऊपर जाकर थोड़ी देर बैठे ही थे कि खाने का बुलावा आया गया..
खाने में स्वादिष्ट दाल-रोटी-और मिक्स सब्जी थी। जिनकी यह होटल रेस्टोरेंट है, वे दो भाई है..हमारी बात छोटे भाई से हुई थी..अब यहाँ उनके बड़े भाई भी आ गए। बहुत सी बातें शुरू हो गई,गढ़वाल की परम्परा,शादी,रोजगार कई विषयों पर बातें चलती रही। इन दोनों भाईयों में बड़े भाई शादीशुदा है, अपने गाँव मे रहकर ही मकान/सिविल ठेकों का काम करते है। और परिवार के साथ होटल भी सम्हालते है, छोटे भाई ने आयुर्वेद कंपाउंडर का कोर्स किया है और फ़िलहाल देहरादून में रहकर सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा की पढ़ाई कर रहे है। पढ़ाई पूरी करते ही कोशिश करंगे कि गाँव के आसपास ही सरकारी नोकरी मिल जाये। ये जानकर बहुत अच्छा लगा कि दोनों भाई जो भी करना चाहते है यहीं रहकर करना चाहते है।बड़े भाई साहब कहने लगें, आपके मोबाइल में कोई नई सिनेमा होतो मुझें दे दो..लेक़िन हम तीनों के मोबाइल में सिनेमा तो क्या कोई हँसाने वाला वीडियो भी नाहज था।
फिर उन्होंने ने अपने ही मोबाइल में इधर शादियों की कुछ वीडियो दिखाई..घुमक्कड़ी में ऐसे पल बहुत मायने रख़ते है..किसी बढ़िया 3 या 5 स्टार होटल में ये पल नही मिल सकते। हम तीनों इन पलों को जी भर कर जी रहे थे।खाने के बाद नीरज ने कोल्डड्रिंक और दीप्ति और मैंने गर्म दुध की फरमाइश कर दी। दूध पीकर दोनों की तबियत मस्त हो गई। गाढ़ा दूध देखकर नीरज का मन डांवाडोल होने लगा,लेक़िन वो कोल्डड्रिंक ले चुका था।
रेस्टोरेंट का सारा सामान अंदर कर के जब पर्दे लगाने का काम शुरू हुआ तो हम तीनों ऊपर कमरे में आ गए।
अभी मौसम सर्द था,बीच जंगल मे करीब 2000 मीटर की ऊँचाई पर रातें अक्सर ठंड़ी ही होती है। घने जंगल के कारण ज़हरीले किट-पतंगे अंदर ना आ जाये इसके लिए होटल वाले भाई ने कमरे का दरवाजा बंद ही रखने की हिदायत दे दी थी। तो बंद कमरें मे कुछ देर इधर उधर की पंचायत की। फिर निंदिया रानी आकर कब सुला गई पता ही नही चला...
अब कुछ फ़ोटोग्राफ़ 

टाइगर फॉल मे सुबह सुबह बस यूँही..

जाटराम की सार्थी


कम है क्या मेघालय से..





OBJECTS IN THE MIRROR ARE CLOSER THAN THEY APPEAR


U टर्न








रिखड़ रेंज..लाखामंडल से 20 किलोमीटर पहले..




 अरे दीदी आप भी ना...
ओये दीदी लड़का नही है...












बहूत याद आतें हैं..ये दिन...






Welcome to Lakhamandal

लाखामंडल..प्राचीन शिव मंदिर..





मुख्य मंदिर के बाहर ऐसे कई शिवलिंग स्थापित है..


नन्हा पुजारी..

ढ़ोल थाप गृह..


 दर्पण वाले शिवलिंग..


कहते है..इस चबूतरे के नीचे बहुत धन-माया है..





मेरा खाना.. छोला चावल..

नीरज ने मेरे छोले के आलु भी अपने कब्ज़े में ले लिए थे..

नज़ारे ए ख़ास राढ़ी टॉप

रात्रिभोज..

22 comments:

  1. बहुत बढ़िया यात्रा अगले भाग का इंतजार रहेगा

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद...

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  2. बहुत ही बढ़िया और रोचक लेख
    मज़ा आ गया....

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी..

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  3. बहुत सहज औऱ सुंदर लिखा है, तस्वीरें उम्दा हैं 👍

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    1. आपके द्वारा तस्वीरों की तारीफ़ उत्साहवर्धन करेंगी..बहुत बहुत धन्यवाद..

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  4. मिरर की फोटो बहुत ही ज्यादा अच्छी हैं। नेटवर्क ना हो तो मज़ा आता है😁

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    1. धन्यवाद...
      पंचायती करने में जो मज़ा है..
      वो फेसबुक चलाने में कहा..

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  5. सुमित जी , marvelous फोटोज..... मजा आ गया देखकर

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  6. आभार-धन्यवाद राणा जी...

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  7. जीतना अच्छा लेखन उतनी ही अच्छी फोटोग्रापी है भाई सा...
    जवाब नही आपका ।

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    1. नवीन जी बहुत बहुत धन्यवाद..

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  8. बहुत ही दिलकश नजारे ओर मनमोहक लेखनी वाकई शानदार यात्रा वृतांत आज ही सभी कड़ियाँ पढ़ ली

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद पालीवाल जी...

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  9. मुझे याद है भाई आपने radi top का रास्ता पूछा था..…और उत्तराखंड में आपको वेस्टरन घाट और मेघालय याद आ जाये तो फिर तो क्या कहने....बढ़िया घुमक्कड़ी बढ़िया पोस्ट भाई

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    1. हा भाई तुम्हारा सुझाव बहुत अच्छा था।
      बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

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  10. शानदार फोटो

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद शर्मा जी...

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  11. बहुत ही बढ़िया और रोचक यात्रा वर्णन । चित्र तो बहुत ही अच्छे

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    1. जी..पूरी यात्रा में एक से एक चित्र मिले.. धन्यवाद आपका..

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  12. Description and photographs are excellent.Enjoy your travelling with @NeerajMusafir & Party.
    When we click on any pics attached, Pic expands and we have to go back and click next picture. Please arrange to recetify that issue.

    Regards
    Niranjan

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    1. धन्यवाद जी..
      आपको हुई परेशानी के लिए भी देखता हूं..👍

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