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Tuesday, 24 July 2018

उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-7 उत्तरकाशी होते हुवे गंगनानी के प्राकृतिक गर्म पानी के कुंड



10 जून 2018
भाग-7 
स्थान- धरासू-उत्तरकाशी-गंगनानी

पिछली रात जहाँ हम रुकें थे। वहाँ असीम शांति थी। थोड़ी थकान भी थी। नींद बढ़िया आई। सुबह 08 बजे नींद खुली। मौसम की ठंडक हम तीनों के नही नहाने का बहाना बनने के लिए काफी थी। बिना नहाएं ही तीनों नीचे आ गए। रात को खाने के बाद जो दूध पिया था,उसका स्वाद अभी तक याद आ रहा था,तो सुबह भी तीनों ने वही दूध बनाने को कह दिया और साथ मे एक एक फैन भी ले लिए,साथ मे बातें भी चलती रही।
अब यहाँ से हमें उत्तरकाशी के लिए रवानगी लेनी थी। तो 9 बज़े कह दिया अलविदा..
यहाँ से थोड़ी दूर ही (क़रीब 5 किलोमीटर) पर बाएं साइड पर पंचानन शिव मंदिर भी आया,मैंने गाड़ी धीमी की..लेक़िन नीरज ने इशारा किया नही रुकते..तो आगें बढ़ गए।
जब वान से धरासू-उत्तरकाशी के लिए रवाना हुवे तब नीरज की गाड़ी के अगले टॉयर की हवा कुछ कम थी,ट्यूबलेस होने के कारण चिंता की कोई बात तो नही थी,पंचर बनाने का सामान और फुट पम्प बनाने का सामान भी साथ ही था। फिर भी आगे के गाँव मे दुकान पर ही पंचर बनवा लिया,इसके एवज में 100 रूपए देने पड़े।
वान से धरासू बेंड तक का रास्ता अधिकतर उतार वाला ही है। रास्ते की शुरुआत में तो देवदार के ऊँचे पेड़ो का साथ रहा.. लेक़िन जैसे जैसे धरासू बेंड की तरफ जा रहे थे,जंगल की सघनता कम हो रही थी और मौसम भी गर्म होते जा रहा था।
11 बजे के करीब हम धरासू बेंड पहुँच गए। धरासू बेंड पर तीन मार्गो का मिलन होता है..
1.धरासू-बड़कोट-यमनोत्री-मार्ग
2.चंबा-धरासू मार्ग
पहला मार्ग बड़कोट से धरासू (हम विकासनगर से चकराता-लाखामंडल होते हुवे इसी मार्ग से आये है।)
दूसरा मार्ग चंबा से धरासू (इस मार्ग से ऋषिकेश से चंबा होते हुए भी आया जा सकता है)
यही दोनों मार्ग धरासू बेंड पर उत्तरकाशी-गंगोत्री मार्ग के रूप मिल जाते है।

धरासू बेंड पर थोड़े आराम के लिये रुक गए। सुबह नाश्ता भी कोई खास नही किया था। तो राजमा-चावल का ऑर्डर दे दिया लेक़िन दो ही प्लेट। नीरज कहने लगा में नही खाऊंगा, मेरे लिए एक समोसा बहुत है। इसका एक कारण था लेक़िन तब उसने बताया नही।
नाश्ता करने के बाद भी यहाँ बहुत देर बैठे रहे।इसका कारण था फ़ोन में नेटवर्क बढ़िया आ रहा था। आख़िर फेसबुक-व्हाट्सएप भी तो देखना होता है ना।
सुबह हम समुद्र तल से 2000 मीटर की ऊँचाई पर थे। और धरासू 1340 मीटर की ऊँचाई पर  है। उत्तरकाशी में यह ऊँचाई 1150 मीटर ही रह जायेगी। यानि कि गर्मी-धूल का सामना करना ही पड़ेगा।
फेसबुक-व्हाट्सएप का मोह छोड़ अब यहाँ से आगे भी तो जाना था। तो चल पड़े उत्तरकाशी की ओर..
अब हम उत्तराखंड के चारधाम यात्रा के प्रमुख मार्ग पर चल रहे थे। चारधाम यात्रा मार्ग को सरल-सुगम बनाने के लिए मार्ग चौड़ीकरण का काम भी चल रहा था। अभी सड़क की स्थिति को बहुत अच्छी तो नही कह सकते लेकिन बहुत बुरी भी नही है। बाक़ी कार और बसों के ट्रेफ़िक के कारण हम थिमी रफ़्तार से ही उत्तरकाशी की ओर बढ़ रहे थे।
धरासू से उत्तरकाशी पहुँचते ही सब से पहला काम था, नीरज की गाड़ी का बेकरेस्ट वैल्डिंग करवाना। पिछली शाम को यह टूटकर अलग हो गया था।
उत्तराकाशी मे प्रवेश करीब दोपहर के 1 बज़े किया तब मौसम में गर्मी और उमस दोनों थे।उत्तरकाशी मे नीरज ने बताया कि यहाँ मित्र तिलक सोनी जी का निवास और कैफे है,
उनसे मिलते हुवे चलेंगे। इतनी गर्मी और उमस मे यह सूचना बहुत सुकूनभरी थी।
सोनी जी का कैफे उत्तरकाशी शहर मे ही है। नाम है..द फ़ूड हैबिट (TFH)
कैफे मे प्रवेश करते ही सोनी जी ने गर्मजोशी से गले लगाकर स्वागत किया,नीरज और उनकी, तो पुरानी मित्रता है। में अभी तक फेसबुक मित्र था,आज नीरज की वजह से मेरा भी भौतिक परिचय हो गया। सोनी जी वैसे तो नवलगढ़ (राजस्थान) के रहने वाले है,लेक़िन अपने हिमालय और प्रकृति प्रेम की खातिर यही बस गए। उन्होंने यह कैफे नया ही शुरू किया है। पूरी तसल्ली से कैफे की हर जगह से रूबरू करवाने के बाद हमें पंखे के पास बैठा दिया। इस कैफे के अलावा तिलक जी पर्यटन के क्षेत्र मे भी सक्रिय है। नेलांग घाटी में आम पर्यटक की आवाजाही शुरू करवाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। इसके अलावा शीत सत्र में बर्फ़ पड़ने के के बाद वे गंगोत्री मोटरसाइकिल यात्रा (स्नो बाइकिंग) का भी आयोजन करते है। इसके लिए बाकायदा बर्फ पर मोटरसाइकिल चलाने का ट्रेनिंग सत्र भी होता है।
चाय नाश्ते की मेज पर ही बातें चलती रही,इस बीच सोनी जी के मित्र,संदीप गोस्वामी जी भी आ गए, गोस्वामी सर भी सोनी जी की तरह हँसमुख है। वे एक सीनियर शेफ भी है इसके साथ कुकिंग के क्षेत्र में ब्लॉग और मैग्जीन में लेखन भी करते है।
जब बात खाने की ही होने लगीं तो सोनी जी ने कहा आप लोग कैफे मे पहली बार आये है। ये लीजिए मीनू कार्ड और बताइये क्या हाजिर किया जाय..? मीनू देखकर खाना पसन्द करना एक कठिन काम है। लेक़िन इसको गोस्वामी सर ने आसान बना दिया, उन्होंने कहा कि हमारा बनाया गया व्हाइट सॉस पास्ता बहुत पसन्द किया जाता है,आप लोग इसे ट्राय कीजिए और साथ मे कोल्ड कॉफ़ी। सोनी जी ने इसी को लॉक कर दिया।
थोड़ी देर में हमारा नाश्ता मेज़ पर आ गया। उसके स्वाद का आनंद ले रहे थे..और अब यह भी समझ आ गया था कि नीरज ने धरासू बेंड पर क्यों पेटभर खाना नही खाया था। वो व्हाइट सॉस पास्ता का सही मायनों मे आनंद ले रहा था। हमारा पेट तो धरासू बेंड के राजमा चावल से भरा हुआ था। कभी तो बदला लेंगे नीरज की इस चाल बाजी का।
अच्छा हाँ.. नेटवर्क बढ़िया था, तो फेसबुक व्हाट्सएप भी जिंदाबाद हो गए। दो दिनों से नीरज की दारूबाजों वाली पोस्ट वाइरल हो गई थी। वो उसी के सवाल-जवाबो में उलझ गया। हम भी कहीं न कहीं उलझ गए। इस बीच बारिश भी शुरू हो गई। और जब बारिश रुकी तो हमें ख्याल आया हम लोग गंगोत्री यात्रा पर निकले है,यहाँ कब तक बैठकर फेसबुक चलाते रहेंगे।
वैसे तो उत्तरकाशी के अपने भी कई आर्कषण है जैसे..काशीविश्वनाथ मंदिर,मणिकर्णिका घाट और भी बहुत कुछ..लेकिन हमारा मुख्य उद्देश्य तो गंगोत्री-हरसिल देखना था। और अब समय भी कम है। तीन दिन बाद हमें दिल्ली भी पहुँचना है। तो अब चल दिये गंगोत्री धाम की ओर।
उत्तरकाशी से निकलते निकलते ही दोपहर के 3 बज गए थे। मौसम भी ठीक नही था। अब यह तो पक्का था कि शाम तक हरसिल नही पहुँच पायँगे। इसीलिए सोच लिया था कि यहाँ से 40 किलोमीटर गंगनानी में ही रुक जायँगे और प्राकृतिक गर्म पानी के कुंड (ऋषिकुंड) में ही डुबकी लगायंगे।
उत्तरकाशी के बाद भी रोड़ कही एक दम बढ़िया और कही थोड़ी टूटी फूटी मिली। लेक़िन बहुत ज्यादा ख़राब भी नही थी। बारिश के कारण भी थोडी धीमी रफ्तार थी। और रह रह कर भु-स्खलन सम्भावना ग्रस्त क्षेत्र भी तो आ रहे थे। इसलिए बहुत सम्हल सम्हल कर गाड़ी चला रहे थे।
भटवाड़ी के आसपास ही नीरज अपने अगले पहिये की हवा चेक करवाने के बहाने एक दुकान पर रुक गया। खेर हवा बहुत कम तो नही थी, फिर भी एहतियात के तौर जाँच करवानी थी। तभी सामने से एक मोडिफाइड मारुति 800 कार आती दिखी। हम तब वहाँ हेलमेट निकाल कर खड़े ही हुवे थे,यही कारण था कि मारुति चला रहे शख्स ने नीरज को देखते ही पहचान लिया और गाड़ी रोक दी। वो शख्स जब अपनी गाड़ी से बाहर आये तो मुझें भी पहचानते देर नही लगी कि यह तो प्रेम फ़कीरा जी है। इस पल लगा कि यह पूरी यात्रा ही किसी शक्ति द्वारा स्वनिर्धारित है..नही तो ऐसे कैसे हम गाड़ी की हवा के बहाने यहाँ रुक गए और फ़कीरा जी से आमना सामना हो गया। वैसे फ़कीरा जी से में पहली बार ही मिल रहा था लेक़िन पहले से उनके बारे में बहुत सुन और पढ़ रखा था। नीरज की गौमुख-तपोवन यात्रा मे जैसा पढ़ा था वैसा ही पाया, प्रेम फ़कीरा जी अपने नाम के मुताबिक मस्त मलंग है, घर छोड़कर सन्यासियों की तरह हिमालय में ही अपना जीवन आध्यात्म की खोज में जीवन का आनंद ले रहे है। उनसे मुलाकात बहुत ज्यादा देर की नही थी। पाँच मिनीट बाद ही वे ऋषिकेश और हम तीनों गंगनानी के लिए निकल पड़े।
भागीरथी के बहाव की विपरीत दिशा में हम भी धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रहे थे। हिमालय का सौंदर्य है ही ऐसा। उत्तरकाशी से गंगनानी की 40-45 किलोमीटर की दूरी तय करने में हमे करीब 3 घंटे लग गए।
गंगनानी पहुँचे तो शाम के 6 बज गए थे। बारिश के कारण जूते और उनके अंदर पैर,भीगने के कारण बहुत ठंडे हो गये थे।
यहाँ पहुँचते ही जूते मोज़े निकाल कर एक रेस्टोरेंट पर डेरा डाल लिया। रेस्टोरेंट के सामने ही थोड़ा सा ऊपर गर्म पानी के कुंड (ऋषिकुंड) और मंदिर है, ठहरने के लिए होटल भी वही है। अबकी बार नीरज और दीप्ति कमरा देखने चले गए और में आराम से रेस्टोरेंट पर बैठा रहा।
थोड़ी देर में ही वो वापस नीचे आ गए। तीनों को जोरों की भुख लगी थी,बारिश में भीगे हुवे थे तो कुछ गर्मा गर्म और कुछ मीठा खाने का बहुत मन था, आधा किलो पकौड़ियां और जलेबियाँ बोल दी। जलेबी तो ठंड़ी थी लेक़िन गर्मा गर्म मिक्स पकोडों ने उसकी कमी पूरी कर दी। फिर भी थोड़ी ठंड लगी तो चाय भी पिली।
अब हम आराम से अपने कमरे पर जा सकते थे। हमारा होटल गर्म कुंड के बिल्कुल सामने था। लकड़ी की शानदार कलाकारी से सजा कमरा देख कर में खुश था। लोकेशन भी बढ़िया। नीरज ने मुझ से पूछा, बता कमरा कितने का होगा ? मैंने कहा होगा 1000 का। वो हँस दिया और मेरे कान में बैठकर धीरे से बोला..600 का है। मैंने कहा-ओये क्या बात कर रहा है..? मोलभाव किया होगा..? नीरज ने कहा नही..होटल वाले ने 600 ही कहे थे। मैंने बोला 500 ले ले यार..तो वो पहाड़ी स्टाइल में मुस्कुरा दिया और बोला भाई जी नही..
बहुत देर तक कमरे में ही मस्ती करते रहे..
आज सुबह नहाए भी नही थे। सुबह सोचा था कि उत्तरकाशी मे नहा लेंगे। लेकिन गर्मी-उमस के कारण द फ़ूड हैबिट कैफे से बाहर भी नही निकले। फिर यहाँ प्राकृतिक गर्म पानी के कुंड में नहाने का सोचा तो ठंड के कारण सोचते ही रह गए। नीरज भी सोने का समय होने तक कहता ही रहा कि आज की तारीख़ में तुझे गर्म पानी मे नहला कर रहूँगा.. लेकिन उसने अपना वादा नही निभाया। ऐसा ही है वो..जो बोलता है वो नही करता है। और जो करता है वो कभी बोलता नही। अजीब होते है ये इंजीनियर। और ऊपर से जाट। खैर अब क्या कहें। 
कमरे में बैठे बहुत देर हो गई थी। सोचा चलो खाना खा लेते है..नही तो निचे पूरा बाजार बंद हो जाएगा। और हुवा भी वही..नीचे आये तो केवल एक ही होटल खुली थी। सारी पूछताछ करने के बाद, मैंने और दीप्ति ने इडली साम्भर और नीरज ने मसाला डोसा की फरमाइश कर दी। इधर सुदूर उत्तर भारत मे,हम ठेठ दक्षिण भारत का खाना खा रहे थे। और स्वाद भी बढ़िया ही था। इधर के रेस्टोरेंट पर अधिकतर नेपाली ही काम करते है। डोसा भी उन्हीं ने बनाया था। 
रोज की तरह खाने के बाद खाने में कुछ मीठे का मन हुवा तो आज फिर चॉकलेट खा ली।
जब ऊपर जा रहे थे तो गर्म पानी के कुंड पर रुककर कुछ छीटे शरीर पर मार लिए..और हो  गया पवित्रिकरणं।
अब हम आराम से सो सकते थे।
सुबह दीप्ति की नींद सबसे पहले खुल गई। शायद सुबह 5 बज़े ही,तो वो सबसे पहले नहाकर आ गई और हम दोनों को भी जगा दिया।
नहाने के लिए महिला-पुरुषों के कुंड अलग अलग है। जब कुंड पर गए तो, में देख कर हतप्रभ था। कुंड से धुँवा निकल रहा था। हाथ डालकर देखा तो पानी काफी गर्म था। वैसे ऋषिकुंड का गर्म पानी चमत्कार का विषय है। विज्ञान कहता है कि ऐसा गंधक की अधिक मात्रा के कारण होता है। ऐसे ही कुंड मे,अब हम डुबकी लगाने की तैयारी मे थे। कुछ देर तो पैरों को पानी मे डालकर बैठे रहे। फिर थोड़ा पानी शरीर पर छिड़का और फिर आहिस्ता-आहिस्ता पुरा शरीर कुंड डूबते चले गया। थोड़ी ही देर मे शरीर भी कुंड के गर्म पानी के अनुकूलित हो गया और अब पानी की गर्माहट भी बहुत ज़्यादा नही लग रही थी। बहुत देर तक गर्म पानी मे रहने के बाद जब वापस कमरे मे गए तो पूरा शरीर हल्का लगने लगा था और नींद भी आने लगी थी। जब बिस्तर पर लेटा तो पहले तो लेटते ही शरीर से पसीना आने लगा और  माँस-पेशियां शिथिल पड़ गई। इसका कारण था,गर्म पानी मे रहने के कारण शरीर मे रक्त का संचार बढ़ गया था। इसी कारण से पसीना भी आ रहा था। जब पसीना थोड़ा कम हुवा तो नींद भी लग गई। फिर करीब आधे घन्टे बाद ही खुली। नीरज-दीप्ति अभी भी सोये हुवे थे। में बाहर आ गया और इधर उधर की फोटोग्राफी करने लगा। कुंड के पास ही गंगा 
नहानी माता मंदिर और ऋषि पराशर तपस्थली है। वहाँ दर्शन किये और कुछ देर बैठा रहा। ऐसा कहते है कि गंगोत्री दर्शन से पहले गंगनानी भी रुकना चाहिए। इसी कारण यहाँ भी अब चारधाम यात्रियों का आना शुरू हो चुका था। 
नीचे रोड पर हथकरघा कारीगरों द्वारा निर्मित ऊनी वस्त्रों की दुकानें सजी थी।
यहाँ से कुछ ख़रीदी भी कर ली।तब तक नीरज-दीप्ति भी नीचे आ गए।
अब कुछ फ़ोटो देखिए।
सुबह का नाश्ता दुध-फेन

पहाड़ी बच्चे भी इस खेल में लग गए।

वान से निकलते ही..

 धरासू बेंड

उत्तरकाशी-गंगोत्री रोड़


धरासू बेंड पर हमारा खाना

 सोनी जी के साथ हम तीनों

यह है..पता,द फूड हैबिट का 

व्हाइट सॉस पास्ता


 नीरज,संदीप गोस्वामी सर,और तिलक सोनी जी

हम दोनों प्रेम फ़कीरा जी के साथ

चारों खाने चित्त..


 गंगनानी


ऋषिकुंड गंगनानी दिशानिर्देश

यम्म...



गंगनानी में हमारा बसेरा बसेरा

 रात्रिभोज-गंगनानी

 शिलाजीत-केसर वाला..


 गंगनानी बाजार

प्रसाद...

ऋषिकुंड-गंगनानी

 कोई तो आएगा..

आप ही आ जाइए..

 पुष्पम समर्पयामि


 गंगनानी के झरोखों से..

ऐसा था 600 का कमरा..

 मंदिर-गंगनानी



11 comments:

  1. बहुत सुंदर चित्रण

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    1. चौरसिया जी बहुत बहुत आभार आपका..

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  2. बहुत बढ़िया वर्णन
    कैमरा अच्छा नहीं है

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    1. Hamesha ki tarah shandar Dr sahib

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    2. धन्यवाद गुरजीत जी..

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    3. एक भी चित्र कैमरे से नही लिया है,सारे मोबाइल से खिंचे है। बारिश के कारण कैमरा नही निकाला।

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  3. वाह वाइट सौस पास्ता का बदला जरूर लेना.....उत्तरकाशी में डोसा खाना ग़ज़ब है अपना देश....बढ़िया पोस्ट

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  4. शानदार यात्रा
    ओर साथ ही व्यंजनों का तड़का

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद महेश जी..

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  5. बहुत ही बढ़िया यात्रा वृतांत.... बहुत अच्छे.... डेस्कटॉप पर फोटो बहुत छोटे नजर आ रहे है ...इसका कुछ समाधान कीजिये आप

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    1. इस अंक के सभी चित्र मोबाइल द्वारा खींचे है..इसीलिए यह दिक्कत आई।

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