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Saturday, 28 July 2018

उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-8 दर्शन गंगोत्री धाम के





भाग 08
11 जून 2018
स्थान- गंगनानी से गंगोत्री धाम

पिछली पोस्ट में आपने गंगनानी के ऋषिकुंड (प्राकृतिक गर्म पानी के कुंड) के बारे पढ़ा था। सुबह ऋषिकुंड मे स्नान के बाद अब हम हर्षिल-धराली-गंगोत्री धाम की जानें कि तैयारी करने लगें। निकलने के पहले कुछ खाना पीना भी जरूरी होता है और रात को जो दक्षिण भारतीय खाना खाया था, उसका स्वाद बढ़िया लगा था। सुबह के नाश्ते में भी तीनों के लिए तीन प्लेट इडली और चाय का ऑर्डर दे दिया। मेरे बग़ल में ही दक्षिण भारतीय व्यक्ति भी इडली-साम्भर का भोज कर रहे थे। वे दक्षिण भारतीय अंदाज मे कहने लगे ये इडली है, इसे यूँ साम्भर में डुबाव और यूँ खाव...वैसे तो हाँ-हाँ कर लिया लेक़िन मन ही मन कहने लगा..अंकल ये आपका दक्षिण भारतीय खाना पूरे भारतवर्ष मे प्रसिद्ध है..और ये आपके सामने जो बैठा हुवे है ना जाटों सी शक्ल वाले नीरज कुमार, ये घाट घाट का खाना खा चुके है। अंकल से मन ही मन बतियाते हुवे नाश्ता ख़त्म किया। हिसाब किताब देखना नीरज कुमार का ही काम था,जो भी बिल हुवा वो और उसके साथ रात के इडली-डोसे का भी बिल था उसे चुकता किया। हाँ रात को हमने खाने के रुपये नही दिए थे। हुवा यह था कि तब हममें से कोई भी पर्स लेकर नही आया था, तो होटल वाले से पूछा कि भाई अभी कमरे से रूपए लेकर आये या सुबह ही दे? 
होटल वाले भाई ने ख़ुशी ख़ुशी कह दिया भाई जी कोई ना सुबह दे देना। यही तो ख़ासियत है पहाड़ो की..नहीं तो किसी महानगर या मैदानी स्थानों पर ऐसा हो जाये तो बिना पैसे दिए जाने ना दे।
नाश्ते की दुकान से विदा लेते हुवे सुबह के 10 बज़ गए थे। अब हम गंगोत्री की ओर निकल पड़े। गंगनानी से गंगोत्री धाम की दूरी 52 किलोमीटर है। गंगनानी की समुद्र तल से ऊँचाई 2020 मीटर के लगभग है,जबकि गंगोत्री धाम की 3140 मीटर है। मतलब रास्ता चढ़ाई वाला है।
गंगनानी से बाहर निकलते ही लोहे वाले पुल से भागीरथी नदी को पार किया। यहीं से सर्पिलाकार रास्तों से सुक्खी टॉप की चढ़ाई शुरू हो जाती है। पहली बार मोटरसाइकिल से हिमालय का रुख किया था तो जहाँ कही भी भू स्खलन क्षेत्र आता,वहाँ हृदय से लब-डब की आवाज़ बढ़ जाती थी। हाँ दिल धड़कता है तो धख-धख नहीं,लब डब की ही आवाज़ आती है।
एक घंटे से भी कम समय मे हम सुक्खी टॉप पहुँच गए। अब हम करीब 2700 मीटर की ऊँचाई पर थे। तेज़ सर्द हवाएं इसे महसुस भी करा रही थी।
गंगनानी से निकलते ही भागीरथी घाटी का सुंदर स्वरूप हमारे सामने था। इन सुंदर दृश्यों का मोहपाश ऐसा होता है कि मोटरसाइकिल छोड़कर बस रुक जाने का मन करता है। फिर ऐसे में दृश्यों को देखते हुवे मोटरसाइकिल चलना भी बड़ा कठिन लगता है। इसीलिए बहुत मन है इस घाटी मे ट्रैकिंग करने का।
थोड़ी देर सुक्खी टॉप पर ही रुके रहे। कुछ देर भागीरथी घाटी को निहारने के बाद चाय पी और फ़िर चल पड़े। अब रास्ता कुछ उतार वाला था।
हर्षिल से 07 किलोमीटर पहले ब्रम्हीताल ताल ट्रैक के लिए एक रास्ता बायीं और अलग हो जाता है। वहाँ से ब्रम्हीताल की दूरी 14 किलोमीटर है।
पुराली मे दृश्य..


झाला गाँव के पास पुल से एक बार फिर भागीरथी नदी को पार कर के अब पुराली की ओर आगे बढ़ने लगे। पुराली के पास ही एक जगह पर, चौड़ी घाटी मे भागीरथी की दो बड़ी धाराएं आपस मे मिलती है। वहाँ बहुत ही मनोरम दृश्य दिखा। कुछ देर वहीं रुकें रहे।
अब हम हर्षिल-धराली के बहुत ही पास थे। हर्षिल से धराली की दूरी 2 से 3 किलोमीटर लगभग ही है। गंगोत्री रोड़ पर बायीं ओर हर्षिल छावनी का प्रवेश द्वार भी आया लेक़िन अभी उस और हम नही गए। सीधे धराली की ओर ही चल दिये।
अभी जिस क्षेत्र मे हम प्रवेश कर रहे थे। उसकी सुंदरता का वर्णन कैसे करूँ ? समझ पाना मुश्किल है। शायद यह काम तो किसी कवि का ही है। बस यूं मानिए बहुत सुंदर दृश्य थे।
धाराली के पहले ही बायीं और एक सुंदर झरना भी आया। इसका नाम था मंदाकिनी फॉल।फ़िल्म राम तेरी गंगा मैली के अधिकतम दृश्य हर्षिल की वादियों मे ही फ़िल्माये गए है। निश्चित ही ओर भी कई फिल्मों की शूटिंग हुई होंगी। फ़िल्म राम तेरी गंगा मैली का तो याद नही लेक़िन जब खुली आँखों से मंदाकिनी फॉल को देखा तो ऐसा लगा सपनों की दुनिया मे ही हु। बहुत अनुपम दृश्य था वो।

नीरज की गाड़ी का अगला टॉयर दो दिन से पंचर हो रहा था। दोनों दिन रास्ते मे मिस्त्री से पंचर भी बनवाया था, लेक़िन हवा निकलना बंद नही हो रही थी। धराली में प्रवेश करते ही हवा-पंचर की दुकान दिख गई। रुककर मिस्त्री जी को स्थिति समझाई तो वो कहने लगे..यह टॉयर कमजोर हो गया है। आप कहों तो इसमें ट्यूब डाल देता हूं। 330 रूपए ख़र्च हुवे। अब नीरज की गाड़ी के ट्यूबलेस टॉयर में ट्यूब डल चुका था और दोनों गाड़ियों की हवा भी चेक हो गई थी। नीरज ने पहले ही निश्चित कर रखा था कि धराली में ही कही 2 दिनों का कमरा लेकर आसपास जहाँ भी घुमना है, घूमते रहेंगे। तो पहुँच गए धराली के बढ़िया लोकेशन पर। होटल का नाम था "होटल आँचल"। यहाँ दो दिन के लिए तीन व्यक्तियों का एक कमरा केवल 1200 रुपये में मिल गया। खाने की व्यवस्था भी यहीं पर नीचे है।
धराली में हमारा ठिकाना..फ़ोटो नीरज कुमार
कमरे में सारा सामान रख दिया। अभी समय दोपहर के 12.30 हो रहा था। अब हमारा अगला लक्ष्य गंगोत्री धाम के दर्शन करना था। थोड़ी देर आराम करने और सारा सामान यहीं छोड़कर 2 बजे के बाद हम गंगोत्री धाम की ओर चल पड़े।
धराली से गंगोत्री धाम की दूरी 20 किलोमीटर के लगभग है। धराली की समुद्र तल से ऊँचाई 2560 मीटर के आसपास है जबकि गंगोत्री धाम लगभग 3140 मीटर की ऊँचाई पर है। मतलब पूरे रास्ते बढ़िया चढ़ाई मिली। लेक़िन इस तरफ भू स्खलन का खतरा कम था। मौसम मे निश्चित ही ठंडक थी। वैसे समान का बोझ कम होने के बाद गाड़ी चलाने में बहुत अच्छा लग रहा था।
भैरोघाटी के पहले ही नेलांग घाटी में प्रवेश का रास्ता भी बायीं और आया। मन तो कर रहा था गाड़ी उधर ही मोड़ दु। लेक़िन उधर मोटरसाइकिल वालों को कहां जाने देते है। वैसे उधर जाने का परमिट भी लगता है और  चारपहिया वाहन से,केवल दिन में ही घूम सकते है। रात रुकने के लिए भी प्रतिबंध है।
नेलांग घाटी का मोह छोड़, हम तो भागीरथी घाटी की सुंदरता को देखतें देखतें गंगोत्री धाम की ओर आगे बढ़ रहे थे। रास्ते मे भैरोघाटी के पास से ही गंगोत्री धाम की भव्यता का अनुभव होने लगा था। भागीरथी घाटी से आसपास की पर्वत श्रृंखला को देखकर बार-बार मन से एक बस एक ही शब्द निकलता..अद्भुत..

दृश्यों को देखने के मोह के कारण पूरे रास्ते, मे नीरज से बहुत पीछे ही चल रहा था मुझे यकीन था कि उसे, इससे कोई दिक्कत नही होगी। रास्ता सीधा ही है। या कहीं मोड़ भी हुवा तो वो मेरे लिए रुक जाएगा। ऐसी यात्राओं में यह विश्वास बहुत आवश्यक होता है, ऐसा ना होतो मिलना-बिछड़ना चलता रहता है और साथ मे भागम-भाग भी मची रहती है। इस मामले मे,में बहुत खुशकिस्मत हु।
गंगोत्री धाम आने के करीब एक किलोमीटर पहले ही पार्किंग एरिया आया,अंदर नीरज को ढूंढा,लेक़िन वो यहाँ नही था। तो मे भी सीधे आगे चल दिया। आगे वह भी रुका हुआ था। साथ मे थोड़ा और आगे चले..बस फिर छोटी छोटी गलियां और दुकानें शुरू हो रही थी। यहीं दोनों गाड़ियां पार्क कर दी। जब में गाड़ी खड़ी कर रहा था तो नीरज चलो आओ कह कर आगे चल दिया। मैंने हउ कह दिया, लेक़िन यह नही देखा कि वो किधर जा रहा है। इधर उधर देखा तो वो कहीं नही दिखा। सोचा कहाँ जा सकता है ? मंदिर ही गया होगा। में तेज़ कदमों से मंदिर की ओर चल पड़ा। तभी अचानक पीछे से एक अजनबी ने आवाज़ लगाई...ओ... डॉक्टर साहब..पीछे मुड़ के देखा तो औचक रह गया, यह अजनबी कौन है ?
वो अजनबी व्यक्ति कहने लगे..वो नीरज भाई साहब पीछे होटल पर ही रुके है, आप भी वहीं चलो। नीरज ने ही इन्हें पहुँचाया था। होटल पहुँचा तो नीरज-दीप्ति यहीं थे। नीरज कहने लगा..तुम्हें आवाज़ लगाई तुमनें सुना ही नही,हम तुम्हें छोड़कर इतनी आगें थोड़ी निकल जायँगे।

खैर थोड़ी हँसी ठिठोली के बाद खाने में हमारी पसंद का छोले-पूड़ी और दीप्ति की पसन्द का बैंगन-भरता आर्डर कर दिया..साथ मे पंजाब की सरकारी लस्सी भी। आगे कुछ कहने की जरूरत ही नही है..हम साथ बैठकर जो खाते है स्वादिष्ट ही लगता है।
खाने से निपटते ही तीनों साथ मे गंगोत्री धाम मंदिर की ओर चल दिये। सभी तीर्थ स्थल की तरह यहाँ भी यात्रियों के काम के चीजों की दुकानें सजी हुई थी। अच्छा लगता है ऐसी गलियों से गुजरना। कहीं गंगाजल, कहीं सुखे मेवे, कहीं शंख, कहीं भगवान जी की मूरत, कहीं ऊनी कपड़े, तो कहीं दवाईया। सब कुछ दिख गया इस छोटी सी गली मे।
थोड़ी दूर बाद गली समाप्त हो गई और हम मंदिर की दहलीज़ पर पहुँच गए। सर झुँकाकर अपने ईश्वर को नमन किया और घंटी को बजाकर ध्वनि तरंगों का ग्रहण कर सीढ़ियों पर चढ़ गए। कुछ सीढ़ियों को चढ़ने के बाद हम गंगोत्री धाम के प्रांगण में प्रवेश कर गए। 
पूरे प्रांगण में श्वेत मार्बल लगा हुवा है। प्रांगण में ही मुख्य मंदिर है। मंदिर का निर्माण 18 वी शताब्दी की शुरुआत का है। मंदिर की आकृति बहुत आकर्षक है। बाह्य आकृति बहुत साधारण लेकिन सुंदर है। मंदिर भी पूरी तरह श्वेत रंग में रंगा हुवा है। ऊपरी ढांचे को देखे तो एक मुख्य शिखर कलश बिल्कुल बीच मे, उसके अलावा चोरों कोनों के चार शिखर कलश, और सामने से मुख्य शिखर के नीचे दो और शिखर कलश जड़ित है। मतलब कुल सात शिखर कलश दिखाई दिए। चारों कोनों के शिखर के बीच स्वर्ण की चादर भी सुशोभित है।  बाकि चारों ओर नीले आसमान के आसपास उच्च पर्वत श्रंखला तो थी ही। बहुत देर तक प्रांगण में बैठे रहने के बाद पहले में दर्शन के लिए चले गया। मेरे बाद नीरज-दीप्ति भी चले गये। उस वक्त बिल्कुल भीड़ नही थी, बहुत आराम से दर्शन हुवे।
यहाँ पर बैठे बैठे मन तो नही भरा था। फिर भी मंदिर प्रांगण के पास ही मुख्य स्नानघाट और पूजास्थल की ओर चल दिये। घाट के पास पहुँच कर पहली बार भागीरथी के अति तीव्र बहाव को देखा। बहाव इतना तेज़ रहता है कि घाट पर नहाने के लिए भी लोटे का प्रयोग करने के लिए निर्देश दिए जाते है। बिना किसी सहारे के डुबकी लगाना भी ख़तरे से खाली नही होता है। तेज़ बहाव के साथ यह गंगा (भागीरथी) जल अत्यंत ठंडा होता है। यहाँ डुबकी लगाना हिम्मत का काम है। और हम तीनों ठहरे महाडरपोक। तीनों नही नहाये। लेक़िन नीरज ने कहा.. तुम तो पहली बार आये हो..स्नान ना सही, जल छिड़काव कर पवित्रिकरणं कर ही लो..तुम्हें मोक्ष मिलेगा..दवाखाने मे मरीज़ो की लाईन लगी रहेगी। वो इतना कह रहा था तो मैंने पवित्रिकरणं कर ही लिया।
यही बैग एक महिला भुल गई थी। नीरज की समझदारी से उन्हें वापस मिल गया।
यहाँ घाट पर ही मुख्य पूजास्थल और स्नानस्थान होने के कारण पंडे पुजारियों के साथ तीर्थयात्रियों की भी भीड़ लगी रहती है। नीरज जहाँ खड़ा था वही कुछ महिलाएं भी थी। उनमे से एक महिला अपने सामान का बैग वहीं घाट पर भूलकर चली गई। नीरज का ध्यान बैग पर गया तब तक वो दूर चली गई होंगी, आसपास देखा तो दिखाई नही दी। फिर सोचा जिसका भी बैग होगा, वो खुद लेने आयेगा ही। ऐसे किसी (पंडो या पुलिस) को देकर आना गलत भी हो सकता है। 10 मिनीट हम वहीं खड़े रहे। और नीरज का अंदाजा सही था, वो महिला दोड़तें दोड़तें बैग की तरफ़ आ ही गई। अपना बैग सही सलामत मिलता देख बहुत खुश हुई। नीरज-दीप्ति को धन्यवाद दिया और जाते जाते कई आशीर्वाद भी दे गई।
अब हम घाट से वापस उसी गंगाजल,घंटी,
भगवान जी की मूरत वाली गली मे चल दिये। थोड़ी दूर चलने के बाद ही बायीं और मुड़ गए। थोड़ा चलने के बाद लोहे वाले पुल से नदी पार कर के उस किनारे पहुँच गए। इस ओर भी कुछ दर्शनीय स्थल है। पुल पार करने के बाद बायीं और मुड़ने पर ही सुर्य कुंड पहुँच जाते है। यहाँ एक विशाल शिला से भागीरथी, झरने के रूप में तेज़ बहाव से नीचे बह रही थी। अद्भुत दृश्य था यह। नीरज ने बताया यही वह स्थान है जहाँ से भागीरथी (गंगा) मानवों का उद्धार करने के लिए अपने मार्ग पर प्रशस्त होती है। (गंगा और भागीरथी नाम मे मुझें भी संशय था। तो बाद में पता चला कि जब गंगा का उद्गम गौमुख से होता है तब उसका नाम भागीरथी होता है। फिर देवप्रयाग में जब भागीरथी का संगम अलखनंदा नदी के साथ होता है तो इनका सम्मिलित नाम गंगा हो जाता है।)
इस जगह का नाम सुर्यकुंड इसलिए भी है.. क्योकि मान्यता है कि सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सबसे पहले यहीं पड़ती है।
उसके अलावा जब शीतकाल में जल राशि कम हो जाती है तो कुंड में एक शिवलिंग भी दिखाई देता है।
सूर्य कुंड के बाद हम गौरीकुंड की ओर चल दिये। थोड़ा आगे चले तो एक बाबा जी दिखे..कहने लगे गौरी कुंड देखना है क्या ? चलों मेरे साथ..दर्शन करवाता हु..हमने उन्हें विनम्रता से मना कर दिया और आगें चल दिये। बहुत दूर जाने पर भी गौरीकुंड का कही निशान ना मिला तो वापस आने लगे,तभी दीप्ति को एक झंडी दिखी और हम दोनों उसके पीछे पीछे चल दिये। थोड़ा नीचे उतरने पर हम गौरीकुंड पहुँच गए। इस कुंड की मान्यता यह है कि भगवान शंकर जी ने माँ गंगा की अपनी जटाओं में धारण कर लिया था। 
हम तीनों कुछ देर यहीं बैठे रहे।
मुझें लगता है कि गंगोत्री धाम को ठीक से देखने के लिए 2 दिन गंगोत्री ही रुक जाना चाहिए। अभी तो जल्दी थी, फिर कभी ऐसा ही करेंगे।
गौरीकुंड से भी अब हमने वापसी शुरू कर दी,रास्ते मे फिर से वही बाबा जी मिले.. कहने लगें हो गए दर्शन.. शंकर,गौरी,गणेश दिखाई दिए कि नही ? हम तीनों हाँ कहते हुवे आगें चल दिये।
जब धराली से चले थे, तो दीप्ति ने जूतों को वही छोड़कर चप्पलें पहन ली थी। उसकी यह गलती थोड़ी दर्दभरी रही। गौरीकुंड से वापसी में कही पत्थर से उसका पैर टकरा गया और नाखून में चोट लग गई, चोट गंभीर तो नही थी लेकिन दर्द तो होता ही है। नीरज हँसते-हँसाते मेन रोड़ के मेडिकल स्टोर तक ले आया,यहीं से ड्रेसिंग का सामान ले लिया। साथ मे टिटेनस के इंजेक्शन भी लेना चाहा। लेकिन दीप्ति खुशकिस्मत थी,मेडिकल स्टोर पर इंजेक्शन मिला ही नही। वो बहुत साहसी है..बस दवाई और इंजेक्शन से ही थोड़ा डरती है।
अब हम धराली के लिए वापसी कर सकते थे।
उसके पहले एक काम और करना था,वह था नीरज कुमार के आगामी इवेंट के लिए कमरों की एडवांस बुकिंग करना। कई होटलों को देखने के बाद, मनपसन्द लोकेशन मिलने पर यह काम भी कर लिया। और  चल पड़े धराली की ओर। मे आराम से पीछे पीछे चल रहा था अपनी ही चाल से। रुकते रूकाते शाम की 07 बजे तक धराली आ ही गये। आकर पास के मंदिर (अघोरी बाबा आश्रम) चले गए। यहाँ से कुछ बढ़िया नज़ारे देखने के बाद सीधे खाने की टेबल पर बैठ गए।
होटल के सामने ही फ़ल की दुकान थी। वहाँ से आती आम की खुशबु ने नीरज कुमार को बेचैन कर रखा था। आखिरकार रहा नही गया तो हम दोनों उस दुकान पर चले ही गये, आम के साथ चेरी भी ले आये। भोजन तैयार होता तब तक फलाहार ही लेते रहे। खैर भोजन तैयार होने में भी देर नही लगी। खाने के बाद खाने में कुछ मीठा लाने का काम नीरज-दीप्ति ने ही किया। में ऊपर कमरे पर आकर लेट गया। चॉकलेट लेकर वो दोनों मेरी उम्मीद के बहुत पहले आ गए। शायद नीचे बहुत ठंड होगी।
मोबाइल नेटवर्क नही था तो.. हो गई महापंचायत शुरू..और महापंचायत में हुई बातें किसे याद रहती है।
तो अभी तो बस इतना ही..अगली पोस्ट मे सातताल ट्रेक और हर्षिल-मुखबा की ओर रुख करेंगे।
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग - 9 सातताल ट्रैक व मुखबा भ्रमण
अब कुछ फ़ोटो और वीडियो देखिए।
गंगोत्री धाम-मुख्य घाट से दृश्य


गंगोत्री धाम- मुख्य मंदिर






सूर्यकुंड की ओर...


सूर्यकुंड

गौरीकुंड की यहीं झंडी देख हमें इसकी पहचान हुई थी।


गंगोत्री-एक झरोखें से..

अब गलियों की सैर









भैया जी जल-बेलियां बनाते हुवे..




भाई सब मोदी का किया धरा है..

गोपाल जी की स्वर्णीम क्षवि..

सूखे मेवे-जाट साहब ने भी ख़ूब ख़रीदे..

गंगोत्री धाम के प्रमुख दर्शनीय स्थल..




मंदिर के उस पार का दृश्य..








धराली-अघोरी बाबा आश्रम में..




कूछ फ़ोटो मोबाइल से भी लिए..





 फोटो बाय नीरज कुमार

अघोरी बाबा आश्रम से शानदार नजारा .दूर उसपार दिखाई देता मार्कण्डेय मंदिर

कुछ वीडियो











12 comments:

  1. हमने भी घर बैठे गंगोत्री दर्शन कर लिए... जय गंगा मैया...

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    1. 😊😊😊😊
      धन्यवाद नीरज जी...
      जय हो गंगा मैया की।

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  2. हम तो साथ साथ घूम ही रहे हैं।मस्त।

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    1. धन्यवाद संजय जी..
      आप साथ ही है तो सफर चलता ही रहेगा।

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  3. लेखन के बीच मे फ़ोटो एकदम सही है जगह का सही विवरण मिल जाता है

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    1. जी यही प्रयास रहता है।
      धन्यवाद...

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  4. वाह डॉक्टर साहब...बेहतरीन वृतांत...ओर नीरज भाई का साथ ...सोने पे सुहागा

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    1. पालीवाल जी सही कहा आपने..
      बहुत बहुत धन्यवाद ।

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  5. जय माँ गंगा मैया की..... बढ़िया लेखनी से बहुत खूब अच्छे से दर्शन करवाए आपने गंगोत्री धाम के..... फोटो बहुत अच्छी लगी

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी..

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  6. अच्छा लिखा आपने।फोटो भी शानदार हैं।

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    1. धन्यवाद राजेश जी...

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