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Sunday, 5 August 2018

उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग- 9 - सातताल ट्रैकिंग व मुखबा भ्रमण

12 जून 2018
स्थान - धराली - सातताल - मुखबा
धराली मे हमारा ठिकाना..
पिछली पोस्ट मे आपने गंगोत्री धाम के दर्शन किये थे। हम तीनों,रात को बतियाते-बतियाते आराम से सोये थे। नतीज़न सुबह भी आराम से उठे। 2500 मीटर से ऊपर की ऊँचाई पर ठहरे हो और तापमान भी 20 से कम होतो नहाने के बारे सोचा भी कैसे जा सकता है..खैर गर्म पानी की व्यवस्था हो जाती। लेकिन फिर भी तीनों ने नहाने की कोई बात ही नही की। पहले में तैयार होकर नीचे आ गया। बिना राय-मशवरें के ही आलू-पराठे बनाने को कह दिया। थोड़ी देर बाद नीरज-दीप्ति भी आ गए। नीरज को जब पता चला कि आलू के पराठे बन रहे है, तो रेस्टोरेंट के एक एक कर्मचारी से कह दिया-  "भाई भले ही 2 रूपए ज़्यादा ले लेना लेक़िन पराठे में आलू ज्यादा भर के बनाना।"
सुबह का नाश्ता तैयार है..


नतीज़न जब पराठे सामने आए तो मज़ा आ गया..अतिस्वादिष्ट आलू पराठो के साथ हम तीनों ने मख्खन टिकिया भी ले ली..
आहा..आनंद आ गया था।
आज हम सातताल ट्रैक पर जाने वाले है। यह बात जब होटल मालिक के छोटे भाई को पता चली, तो वो कहने लगा..भाईजी मे भी सातताल चलूँगा। मैंने कहा..हा ठीक है, ले चलेंगे। खैर जब हम जाने लगे तो वो गायब हो गया..
चाय-नाश्ता ख़त्म होते ही, सुबह 10.40 बज़े हम तीनों ही चल पड़े सातताल की ओर। रास्ता आँचल होटल के सामने से ही था। कुछ सीढ़ियों को चढ़ने के बाद कच्चा-पक्का रास्ता मिल गया। में नया नया ट्रैकर हु..तो नीरज मुझें आगे रहने के लिए कहता है..में कोशिश भी करता हु..आगे ही रहु..लेकिन कभी-कभी फ़ोटो लेने के चक्कर मे पीछे रह जाता था।
थोड़ा ऊपर चढ़ते ही सेब के बगीचे भी मिलना शुरू हो गए। लेक़िन अभी सेब पके नहीं थे। सभी सेब, नन्हें-नन्हें, हरे हरे थे। ओर आगे जाने पर एक ग़ुलाब की बगिया भी दिखी..यह बगिया ख़ूब हरी-भरी-लाल थी। अब हम थोड़ी और ऊँचाई पर आ गए थे। यहाँ एक गाँव और कुछ घर भी थे।
नीरज-दीप्ति आराम से ही चल रहे थे। मुझे ट्रैकिंग का कुछ अनुभव नही है। में तो बस चले ही जा रहा था। मुझें नही पता है कैसे चलना है। कब और कितनी देर रुकना है। कुल मिलाकर ट्रैकिंग करना कला का काम है..चलना कलाकारी ही है..नही तो शरीर और दिमाग को थकते देर नही लगती है। खैर मुझें कोई तकलीफ नही आई।
वैसे सातताल ट्रैक,पिछले ट्रैक- मोइला बुग्याल ट्रैक से थोड़ा कठिन ट्रैक है। ऐसा इसलिए कि मोइला बुग्याल में हमने 2 - 2.5 किलोमीटर मे 200 मीटर की ऊँचाई प्राप्त की थी। और आज सातताल ट्रैक पर दूरी 4 किलोमीटर के आसपास दूरी तय करके, ऊंचाई करीब 450 मीटर प्राप्त करेंगे।

भोजपत्र का पेड़..
चलते चलते एक घंटे से ज्यादा समय हो गया था।नजारों के साथ साथ वनस्पति भी बदलते जा रही थी। एक जगह हमें भोजपत्र का पेड़ भी दिखा। मैंने यह पेड़ पहली बार ही देखा था।भोजपत्र का पेड़ दिखने में सामान्य पेड़ो की तरह ही था। बस इसके तने की छाल पतली परतो के रूप मे थी। यह छाल ही भोजपत्र यानि प्राचीन कालीन पेपर थी। 
जैसे जैसे ऊँचाई पर जा रहे थे, परिदृश्य ओर सुंदर होते जा रहा था। ऐसी ही एक जगह सेल्फ़ी लेने के बहाने रुक गये। तभी वहाँ से एक पारिवारिक समुह गुजरा। नही तो अभी तक तो हम तीन ही दिख रहे थे।
जब यहाँ से आगे बढ़े तो मेरे आगे पारिवारिक समुह की दो महिलाएं चल रही थी। मैंने नीरज को देखा तो..मुझें ऐसा लगा की वो कह रहा हो "निकलो आगें.."  मैने हँस के कह दिया ओवर टेक करो मत..ओवर टेक होने दो..नीरज मुस्कुरा दिया। यह सिख उसने मुझे पिछली रात ही तो दी थी।
जैसे जैसे हम ऊपर चढ़ रहे थे, जंगल भी घना हो रहा था। ऐसे में धूप से बचाव भी मिल रहा था। हम तीनों अपने अपने हिसाब से चल रहे थे। कभी कोई आगे तो कभी कोई पीछे। मे ज्यादा पीछे रह जाता तो नीरज एंड कंपनी भी रुक जाती। ऐसे ही ,एक ओटले पर नीरज बैठा मिला। में तेज चढ़ाई पर भी एक ही गति पर चल रहा तो उसने समझाया कि "तुम बहुत तेज़ क्यो चलते हो...इतना धीरे चलो की मुँह से साँस न लेना पड़े।" तभी से इसकी प्रेक्टिस शुरू कर दी।
उस जगह हम बहुत देर बैठे रहे..नीरज ने यहाँ एक दो फ़ोटो खिंचने के बाद कहा..तुम यही बैठे बैठे ऐसा फ़ोटो लो कि फेसबुक पर देखने के बाद लोग उसे चोरी करे बिना न रह पाएं। मैंने अपने हिसाब से दो फ़ोटो लिए..लेकिन महाराज जी संतुष्ट नही हुवे।
फिर उन्होंने कैमरा अपने हाथ मे लिया और दो फ़ोटो लिए..यह रहे वो दोनों फोटो..


नीरज वैसे तो बिना पूछें कुछ सिखाता नही है।लेकिन कभी-कभी मेहरबान भी हो जाता है। जब सिखाता ही है..तो साथ मे प्रेक्टिकल भी करवाता है। उसका यह तरीका अच्छा लगा।
इस चक्कर मे हम दोनों पीछे रह गए थे। दीप्ति हमसे आगें ही कही रुकी होगी। अब यहाँ से आगें चल दिये...हाँ में इतना ही धीरे चल रहा था कि मुँह से साँस नही लेना पड़े..खैर यह भी एक प्रेक्टिस है..करते रहंगे।
थोड़ा आगें बढ़े तो दूर पेड़ के नीचे दीप्ति बैठी हुई थी। उसने हाथ हिलाकर पानी मिलने का इशारा किया, हम तीनों के बीच एक ही पानी की बोतल थी, वह भी खाली हो गई थी। जल्दी से हम दोनों भी पेड़ के नीचे, पानी के पास चले गए। ऊपर कही से एक जलधारा आ रही थी, जल एक दम शीतल व निर्मल था।
पिछले डेढ़ घंटे से हम चले ही जा रहे थे। पेड़ की छांव मिली तो आराम से बैठे रहे। हर्षिल की दिशा में एक ऊँची चोटी दिख रही थी। नीरज से उसके बारे में पूछा तो बताने लगा - " वो सामने चोटी दिख रही है ,उसे पार करने के बाद क्यार्कोटी लेक (3800 मीटर) आती है, उसके बाद लम्खागा पास (5380 मीटर) पार कर के हिमाचल प्रदेश के चितकुल मे प्रवेश कर सकते है।" 
मतलब उधर ही हर्षिल-चितकुल ट्रैक है। इसे हर्षिल से भी शुरू कर सकते है और चितकुल से भी। यह एक कठिन ट्रैक है। भारत-चीन सीमा की नजदीकी के कारण इनर लाइन परमिट भी आवश्यक होता है। इसे उत्तरकाशी से प्राप्त किया जाता है।
उधर ही कहीं एक छोटी सी, रहस्यमय झील है, जिसके पास तालियां बजाने पर पानी मे तेज तरंगे और बुलबुले उठते है। लेक़िन इस झील का नाम और सटीक स्थिति हमें नही पता चल पाई।
यहाँ बैठे बैठे बहुत देर हो गई थी। खूब आराम हो गया..तो फिर आगे चल दिये। उठे तो मेरा चश्मा नही मिला, याद आया कि शायद अभी जहाँ फ़ोटो लेने के लिए बैठे थे वही भूल आया हु। नीरज-दीप्ति को कह दिए तुम लोग चलो..में चश्मा लेकर आता हूं। भागा भागा नीचे आया लेक़िन चश्मा नही मिला। नीरज-दीप्ति बहुत आगें निकल गए होंगे, यह सोचकर मैने भी अपने चलने की गति तेज कर दी। रास्ते मे एक ताल जैसी जगह दिखी, लेकिन में अनदेखा कर आगें बढ़ गया। जब साँस फूलने लगी तो पेड़ के नीचे बैठ गया। थोड़ी देर बाद नीरज एंड कंपनी भी आती दिखाई दी। देखते ही आश्चर्य हुवा.. ये कहाँ रुक गए थे।
वो दोनों पास आये तो मुझे कुछ पूछ्ना ही नही पड़ा। नीरज की प्रवचन माला शुरू हो गई.."तुम्हें पता है ? तुम अभी सातताल के पहले ताल के पास से निकल आये। वहाँ रुके क्यो नही"
में - मुझे कुछ स्पेशल नही लगा।
नीरज - स्पेशल नही लगा..तो तुम्हें क्या लगा..ताल के पास होटल मिलेंगे, बहुत बड़ी झील मिलेगी, नावें चल रही होंगी।
में - हाँ और झंड़ी भी लगी होगी..
नीरज - पहली ताल में पानी था..फिर भी तुम पहचान नहीं पाए। दूसरा ताल बिल्कुल सूखा मिलेगा कैसे पहचान करोगे। तीसरा और चौथा ताल बहुत ऊपर है। उसके बाद पाँचवा, छठा, सातवाँ ताल कहाँ है ? इसकी पहचान स्थानीय  लोगों भी ठीक ठीक नही है। तुम्हें पहले ताल को देखने का मौका मिला था और तुम बिना देखे भाग आये। व्हाट आर यू डूइंग हियर..
अब आगें चलो, पहले ताल पर वापसी मे रुकना और डुबकी भी लगाना, वहाँ डुबकी लगाने से मलेरिया, डेंगू, बवासीर जैसे रोग नही होते...
सुनते सुनते मुझें भयंकर हँसी आ रही थी।
मैंने कहा..बस करो महाराज।
जैसे तैसे वो शांत हुआ।
तब तक शरीर को भी आराम मिल चुका था। आगें तेज़ चढाई थी। आराम से चढ़ते रहे 
थोड़ा ही आगे दूसरा ताल भी दिख गया। लेक़िन बिल्कुल सूखा घास का मैदान था।
अब हम तीसरे ताल की ख़ोज मे चल पड़े। जैसे जैसे आगे बढ़ रहे थे, चढ़ाई कठिन हो रही थी। धीरे धीरे आगें बढ़ते रहे। तीसरे ताल पर भी पहुँच गए। यहाँ पानी था। कुछ फ़ोटो लेने के आगें चल दिये। नीरज को अंदाजा था कि चौथा ताल भी पास ही है। पगडंडी की दिशा मे ही ऊपर चढ़ते रहे। मे सबसे पीछे ही चल रहा था। थोड़ी चढ़ाई के बाद नीरज-दीप्ति बैठे दिखाई दिए। समझ गया चौथी ताल (3000 मीटर) भी मिल गई। जाते ही आराम से बैठ गया। हरियाली अभी बहुत ज्यादा तो नहीं थी फिर भी बहुत अच्छा दृश्य मिल रहा था। ख़ालिस प्राकृतिक दृश्य अद्भुत ही होते है। यहाँ कुछ भी मानव निर्मित नही था। प्राकृतिक झील और यह पिछली झीलों की तुलना में बड़ी भी थी। एक पेड़ के नीचे हम तीनों बैठे है..झील के आसपास भेड़-बकरी पानी पी रही है। कुछ भी बनावटी नही था वहाँ।
में बहुत देर तक लेटे रहा..दीप्ति ने बैग में से चॉकलेट और असली काजु बादाम भी निकाल लिए और साथ मे एक एक लस्सी का पैकेट भी। खा-पी के वापस ऊर्जावान हो गए।
यहाँ बैठे बैठे 1 घन्टे से ज्यादा हो गया था। समय रहते हमें वापसी भी करनी थी। तो 2.30 बजे के आसपास वापसी शुरू कर दी।
वापसी मे एक डंडा भी हाथ मे ले लिया था। इससे नीचे उतरने मे बहुत आसानी हो रही थी।
मे बहुत आराम से नीचे उतर रहा था। थोड़ा लालच फ़ोटो खिंचने का भी था। नतीज़न नीरज-दीप्ति बहुत पहले ही नीचे पहुँच गए। में जब नीचे पहुँचा तो शाम के 4.30 बज़ गए थे। कमरे में पहुँच कर रिफ्रेश हुवा, इतने में नीरज बाबू ने अगला कार्यक्रम बता दिया। अब हम मुखबा की ओर जाने वाले है। वहाँ तो हम अपनी अपनी मोटरसाइकिल से जा सकते थे। 5 बजे के पहले ही हम तीनों मुखबा की ओर निकल पड़े। 
धराली से हर्षिल की ओर निकलते ही एक हेलीपेड दिखाई दिया,हेलीकॉप्टर भी था,कुछ फ़ोटो लिए और आगें चल दिये। जब एक बार फिर मंदाकिनी फॉल के सामने से निकले तो इसकी खूबसूरती को बस देखते ही रह गए। इस क्षेत्र को प्राकृतिक रूप से खूबसूरत बनाने मे ईश्वर ने कोई कमी नही छोड़ी है। अद्भुत जगहें है। अब हम गंगोत्री-उत्तरकाशी मार्ग को छोड़कर दायीं ओर, हर्षिल मुखबा की ओर मुड़ गए, स्वागत द्वार पर ही मुखबा ग्राम पंचायत के बोर्ड पर पॉलीथिन मुक्त गाँव का बोर्ड भी लगा था। एक बात ओर, वो यह कि धराली-हर्षिल में ही फ़िल्म राम तेरी गंगा मैली की भी शूटिंग हुई है..फ़िल्म की नायिका मंदाकिनी के नाम पर ही फॉल का नाम मंदाकिनी फॉल पड़ा है।
एक पुल को पार कर के जब,हर्षिल मे प्रवेश किया तो यह वैसे तो आम गाँव क़स्बे जैसा ही दिखा, फिर भी भारतीय सेना की छावनी होने के कारण साफ़ सफ़ाई व्यवस्थित थी। हर्षिल मे बिना कहीं रुके सीधे मुखबा की ओर ही चल दिये। वैसे भी सेना की छावनी होने के कारण निश्चिंत होकर फ़ोटो नही ले सकते थे।
हर्षिल के बाद मुखबा की चढ़ाई शुरू हो गई। रास्ते मे ही मंदाकिनी फॉल की ऊपरी मंजिल आई। मतलब यहाँ भी फॉल था। सड़क किनारे ही दूध के समान सफ़ेद, विशाल जलधारा, अतितीव्र वेग से नीचे गिर रही थी। इस जगह से गाड़ी निकालने में बहुत सावधानी रखना थी। नीरज एंड कंपनी वीडियो कैमरे के साथ पहले से तैनात थी। गाड़ी सफलता पूर्वक निकलने के बाद आगे चल दिये। यहाँ से कुछ ही किलोमीटर के बाद हम मुखबा पहुँच गए। मुख्य गाँव सड़क से कुछ ऊँचाई पर बसा हुआ है। सड़क किनारे ही गाड़ी खड़ी कर सीढ़ियों वाले रास्ते से ऊपर चल दिये। इस रास्ते से हम सीधे गंगोत्री मंदिर पहुँच गए। जी हाँ मुखबा में भी गंगा माँ का मंदिर है। जब गंगोत्री धाम में दीपावली के पश्चात कपाट बंद हो जाते है (बर्फ़बारी के कारण 6 महीने वहाँ कपाट बंद रहते है।) तब गंगा माँ अपने मायके, मुखबा में आ जाती है। 6 महीने के यहाँ के प्रवास के बाद फिर अक्षय तृतीया के आसपास यहाँ से डोली द्वारा धूमधाम से यहाँ के बाशिंदे पैदल यात्रा कर गंगा मैया को अपनी बेटी की तरह विदा कर गंगौत्री धाम ले जाते है। यह क्रम हर वर्ष अनवरत चलते रहता है। और इस परम्परा का निर्वहन मुखबा वासी सदियों से कर रहे है। 
यहाँ का मंदिर भी गंगोत्री धाम के मंदिर की प्रतिकृति है। अभी यहाँ के कपाट तो बंद थे, फिर भी मुख्य मंदिर के पास से ही महिलाओं के कीर्तन की आवाज़ और ढोलक की मधुर थाप सुनाई दे रही थी। मंदिर प्रांगण में ही यात्री कुर्सी लगी थी, तीनों अलग अलग कुर्सियों पर बैठ गए। बहुत शांति थी यहाँ, चुपचाप बैठा था, तो लग रहा था कि वक़्त भी ठहर गया है। किसी को कोई जल्दी नही थी, ढोलक की थाप भी थमी थमी सी सुनाई दे रही थी। अजीब सम्मोहन है इस जगह का भी। प्रांगण में ही कुछ बच्चें भी खेल रहे थे, इनकी शक्ल मुझें तिब्बतियों जैसी लग रही थी। बात करने कि कोशिश भी की, लेक़िन वे पास ही नही आये। शायद शरमा रहे होंगे। 
मंदिर के आसपास ही गाँव की बसावट है। गाँव के घरों की हालत इस गाँव की प्राचीनता का आभास करा देती है। सदियों पुराने है ये घर।
बहुत देर हो गई थी मुखबा गाँव मे ही। हमारा ठिकाना तो धराली में ही है। अभी नही तो.. थोड़ी देर से जाना तो था ही, तो इस जगह की नमन कर फिर से धराली की ओर चल दिये।
वाटर फॉल क्रासिंग पर कुछ देर रुकने के बाद फिर चले, तो में आगें चल रहा था। सोचा हर्षिल मे तो रूकने का कोई काम है ही नही, तो तेजी से गंगोत्री रोड़ पर आ गया। यहाँ रुककर नीरज की राह देखने लगा। थोड़ी देर बाद वो आया..और आते ही मुझे घूर के कहने लगा - हमें बगोरी भी जाना था,लेक़िन तुम जब आगे चलते हो तो पीछे देखते ही नही हो..मैंने कहा- तो क्या हुवा, पास ही तो है..चलो अभी चलते है। लेक़िन उसने ना कह दी। मुझें ऐसा लग रहा था जैसे वो कह रहा हो - तुम्हारी ऐसी की तैसी..। अजीब है ये नीरज..पहले से कुछ बताता नही है..साथ चलो तो दिक्कत..आगें चलो तो दिक्कत। ऐसे भी भला कोई करता होगा।
वहाँ से धराली की और चल दिये..रास्ते मे एक बाबा जी मिले..आगें के लिए लिफ्ट मांगी तो बैठा लिया..
होटल पहुँच कर अब आराम करना था। सुबह से घूम रहे थे। बहुत थकान तो नही थी फिर भी आराम करना अच्छा लग रहा था। अपने अपने जूते खोलकर बैठे तो दीप्ति को बदबु आने लगी..उसे इसकी पहले से पहचान थी कि यह बदबु नीरज के चमड़े के जूते में रहने वाले पैरों की थी। तत्काल आदेश जारी हो गया कि जाव..पैर धोकर आओ..अब मेरे खुश होने की बारी थी। वहीं नीरज खुद को प्रताड़ित महसूस कर रहा था,उसे इतनी ठंड में ठंडे पानी से पैर धोना पड़ेंगे। गृह मंत्रालय का आदेश मानना भी जरूरी था। नल के नीचे पैर गीले करने में उसे कई सेकण्ड लग गए..कभी अपना सर दिवाल पर ठोका तो कभी पानी से डरा.. लेक़िन उसे पैर धोकर आना ही पड़ा। बहुत खुशी हो रही थी मुझें। वीडियो भी बनाया था उसकी इस हरकत का।


थोड़ी देर मे ही नीचे से खाने का बुलावा भी आ गया। खाने में सब्जी-दाल-रोटी का कह दिया था। आराम से भोजन करने के बाद वापस कमरे मे आ गए। अब हमारी घर वापसी की उलटी गिनती शुरू हो चुकी थी। कल ही दिल्ली के लिए निकलना है। सुबह जल्दी उठेंगे, इसीलिए आज की पंचायत में ज्वलंत मुद्दे नही छेड़े। जल्दी ही बत्ती बुझा कर सो गए।
यात्रा आगे भी जारी रहेगी।
भाग -10 धाराली से इंदौर वापसी
अब कुछ फ़ोटोग्राफ़ देखिए
होटल आँचल



रेस्टोरेंट आँचल..

होटल के सामने ही..


सातताल ट्रैकिंग शुरू..

थोड़ा चलने के बाद पीछे का दृश्य..

ग़ुलाब की बगिया..



वो आ रहा मेरा बाँके-बिहारी..

थोड़ा और ऊपर जाने पर..








एक बार आइडिया मिलने के बाद में भी शुरू हो गया..






पानी के सोते के पास थोड़ा आराम..

सामने की दिशा में दिख रही पहाड़ी चोटियों पर ही हर्षिल-चितकुल ट्रैकिंग का मार्ग है..


दूसरा ताल..सुखा हुवा था.. 

कैसा है..?

यह है..सातताल का,तीसरा ताल..



और यह चौथा..



चौथे ताल पर जी भर के आराम किया..

सीख गया ना..? 

वापसी...






 कैमरे का जुमिंग पॉवर बढ़िया होतो धराली से ही मुखबा मंदिर के दर्शन हो सकते है..



धराली का ऊपरी दृश्य..

हर्षिल-धराली के पास हेलीपैड...


भागीरथी के उस पार से धराली का दृश्य 


कुछ दृश्य मुखबा की गलियों के..


पलट...
पलट गया..


बंद..
अतिप्राचीन घरो में ताले ही टंगे मिले..
गंगोत्री मार्ग का दृश्य मुखबा के पास से..

मुखबा से लौटते वक्त हर्षिल के हेलीपैड के पास NIM के छात्र ड्रील करते हुवे भी दिखे..


हर्षिल के प्रवेश द्वार के बिल्कुल सामने से..

रोज़ एक ऐसा फ़ोटो भी जरूरी है..


रात्रिभोज धराली मे..
कुछ वीडियो मुखबा गाँव के..






6 comments:

  1. इस बार का ब्लॉग पढ़ के कुछ ज्यादा ही मज़ा आया
    फ़ोटो बहुत ही शानदार है....

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद गुप्ता जी...

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  2. शानदार वर्णन डॉक्टर साहब

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    1. धन्यवाद अमित जी....

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